असुविधा : वरवर राव की पाँच कविताएँ

अनुवाद : उज्जवल भट्टाचार्य

ज़िन्दगी और मौत की जंग लड़ते कवि वरवरराव किसी परिचय के मुहताज नहीं हैं. इस उम्र में सत्ता का उनके साथ व्यवहार ख़ुद एक परिचय है. जाने-माने अनुवादक उज्ज्वल भट्टाचार्य ने इधर लगातार उनकी कविताओं के अनुवाद किये हैं. उनमें से पाँच यहाँ

कवि

 

व्यवस्था जब अन्यायी हो

और समय के लहराते बादल

गला घोंटने लगे

न तो ख़ून बहता है

न आंसू गिरते हैं

 

बिजली की कड़क गरज बन जाती है,

फ़ुहार बन जाती है बाढ़, और,

मां की पीड़ा के आंसुओं को सोखकर

निकल पड़ता है जेल के सींखचों को तोड़कर

कवि का संदेश.

 

जब ज़बान हरकत में आ जाती है,

ध्वनि से आज़ाद हो जाती है हवा, और

गीत युद्धभूमि में मिसाइल बन जाते हैं

दुश्मन कवि से डरने लगता है;

उसे क़ैद कर लेता है, और

उसके गले में फ़ंदा कस देता है

लेकिन, कवि अपने गीतों के साथ

जनता के बीच सांस लेता है

 

मचान

गिरते हुए बोझ की तरह

धरती पर फैल जाता है

मौत को चुनौती देते हुए

दूर कर देता है

तुच्छ जल्लाद और कब्ज़ावर को.

बोझ हल्का करने का गीत

 

पूरवैया की तरह

तुम याद करने आई

दिल छूने वाली कहानियां

आंसू से भरी गोदावरी सागर से जिन्हें कहती थी.

 

पेड़ की तरह निस्पंद

जीवन की बयार के लिये तड़पता हुआ

मैंने अपना मुंह खोला.

क्या हम दोनों के बीच कोई अदृश्य हाथ था?

क्या हम, ख़ुद पर हुक्म जारी करते हुए,

ख़ामोश हो चुके थे?

तुमसे नज़र चुराने के लिये

मैंने अपने आंसू

हलक से उतार लिये.

दिनभर ये आंसू मेरे गले में बिंधते रहे.

 

अब, यह रात,

यह रात जबकि सागर अपनी गोद में

गोदावरी को लेकर उसे तसल्ली देता है,

सुर बांधकर, जो बेसुर हो चुके हैं

गहरी सांसों में.

सांस लेते हुए हारमोनियम की तरह मेरे दिल में

दोनों हाथों से.

 

मैंने अपना चेहरा धो लिया

याददाश्त से उभरते शोकगीत से.

अब गले में कोई कांटा नहीं

आंखों में भी नहीं.

हमारे बीच

अथाह समय के इस सेतु पर

– हम बात करने के लिये मुंह नहीं खोल सके –

 

बोझ हल्का करने वाला यह गीत मैंने सिपुर्द किया.

 

तुम तक यह पहुंचेगा परिंदे या फूल की तरह

या फिर पागल हवा की तरह.

 

क्या तुम्हारा जवाब कोमल नहीं होगा?

 

सबकुछ कहने के बाद

 

मेरे लिये

लिखने का परिदृश्य,

धरती की दरार से

शब्दों की ज़ंजीरों को निचोड़ते हुए

एक अंतहीन गति है.

 

लिखने में भी

दबाव और तनाव से ध्वनि पैदा होती है,

उल्लास के ताने-बाने में गूँजती हैं.

पैदा करती हैं फिर से

शब्द

जनता की भाषा

गति के साथ आगे बढ़ती हुई.

 

मेरे अपने अस्तित्व में

अंकित हैं –

ताकतें जिन्हें मैंने जिया है और जिन्हें इंतज़ार है

आनेवाले जीवन का.

 

पसीना महकते इन्सान के माथे पर

ख़ून की अमिट छाप

मैं उसे पोंछने की कोशिश करता हूं

मैं न तो छू सकता हूं न गंदा कर सकता हूं

सितारों से भरे आसमान में फैली सूरज की शानदार तस्वीर को.

 

ऊपर की ओर देखता हूं,

मेरे हाथों का श्रम

ले जाता है मुझे उन हाथों तक

जो श्रम में व्यस्त हैं

अगर मैं अपना श्रम फैलाता हूं

मुझ तक

महसूस करता हूं, हां, ले जाता है !

 

ख़ामोशी में पढ़ते हुए

महसूस करता हूं एकटक देखती नज़रों को

होंठ हिलते ही ज़बान खेलने लगती है

मेरे जीवन्त तारों में

गूँजती हैं आती हुई आवाज़ें.

 

मैं महसूस करता हूँ

मानों कि श्रम से

मुझे संकेत मिले हैं

इस रहस्य से भरी सृष्टि के.

 

फिर भी मुझे पता है

यह सिर्फ़ हमदर्दी है

श्रम को मैंने जिया नहीं.

 

मैं सिर्फ़ झकझोरते हुए जगाता हूं अनेक को

मेरी अस्थियों से मुक़ाबले के लिए

ज्वालामुखियों को शांत करते हुए

वसन्त के सोतों को मोड़ते हुए

धरती से जुड़ी मेरी आंतरिक सत्ता से

शायद पावलोव के कुत्ते की तरह.

 

लेकिन मैं जो

इन्सान को पढ़ने का आदी हूं

क्या पुस्तक विकल्प हो सकता है

इस दुनिया का ?

 

 

शिनाख़्त का दिन

1-

क्या सल्तनत इसे मान लेगी

अगर बग़ावत के चलते

आवारा और बेगैरत

बहादुर बन जाएँ ?

नायक खानदानी होने चाहिए.

 

अगर जंगली एकसाथ हो जायं,

गारा, लकड़ी और पत्थर जुटाते हुए

बसेरा बनाने लगें;

क्या यह कोई कथा बन जाएगी?

इतिहास की बुनियाद होनी चाहिए.

 

क्या तुम पहाड़ के ऊपर एक दिया जलाओगे

फटेहाल

बुलेट से छिदे गोंड के लिये?

दीये बड़े लोगों के लिये जलाये जाते हैं.

 

2

बेशक, अगर मुझसे उनकी बस्तियों के बारे में पूछा भी जाय

मैं क्या कह सकता हूं?

शहरों को बनाकर

वे जंगल की कोख में चले गये –

अगर मुझसे गिनने को कहा जाय

वे साठ थे या तेरह,

मैं सिर्फ़ सितारों की ओर इशारा कर सकता हूं

जबकि तुम मुआवज़े की फ़ेहरिस्त के साथ अकड़ सकते हो

 

किसने उनकी नाड़ी काटी और उन्हें नाम दिया

जो जंगल में जने और छोड़े गये?

शायद वे तुम्हें पहली बार मिले

सेंसस के आंकड़ों

और वोटरों की लिस्ट में;

शायद उन्हें आदिलाबाद के अस्पताल से बाहर किया गया,

या आज स्मारक बनाकर कहा गया

इन्हें पट्टा नहीं मिल सकता है.

 

वहां,

पेड़ और गढ़े, वादियां और चोटियां

पंछी और गिरगिट, पानी और आग़

इन्सान और जानवर, जंगल साफ़ कर उगाई गई फ़सल, और बसेरे

अंधेरा और रोशनी,

उन सबके बस एक नाम हैं :

जंगल

जंगल माँ भी है और ख़ुद बच्चा भी.

 

जंगल की गोद में बसे

आदिवासियों

और उनकी शक्ल में पल रहे

जंगल की ख़ौफ़ से,

तुमने ही

उनकी शिनाख़्त की

 

डर फैलता गया

बोडेनघाट और पिप्पलधारी में

इंद्रावेल्ली और बाबेझरी में

और सतनाला में

बांस की खपच्चियों से घिरी हुई

उनकी ज़िन्दगी तुमने तहस-नहस कर दी

 

कनस्तर और कारतूस

खदान के ख़ून और सल्फ़र गैस के साथ

धरती की दरारों में

तुमने उनकी बपतिस्मा का जश्न मनाया

हासिल सिर्फ़ इतना है

अब तुम उन्हें कभी ख़त्म नहीं कर सकते

 

3

बहादुर उभरते हैं

वे इतिहास की ही पैदाइश हैं

क्या कोई वह तारीख बता सकता है

जब आदिवासी पैदा हुए थे?

जबकि तुमने साल-दर-साल

चालू खाते के लिये

बीस अप्रैल की तारीख तय कर रखी है

लेकिन इस बार

इतिहास की चकाचौंध में लड़खड़ाते हुए

उन्नीस मार्च को ही तुम

देवक की कालकोठरी में घुस पड़े

 

4

मेरे दिल में मचलती

जंगली फूलों के ऊपर से आती हवा

अब पर्वतों की चोटियों पर लहराती है

आसमान ने जंगल को एक दृश्य में बदल दिया

इन सबसे बेख़बर, गोदावरी अपनी घाटी में

मुरझाती हुई बहती जाती है

 

5

परसों के लोग शायद कल नहीं रह गये थे;

कल के दावे आज ग़ायब हो चुके होंगे.

फिर भी, इंद्रावेल्ली परसों भी था, कल भी और आज भी.

 

इंद्रावेल्ली शायद मिल्कियत नहीं थी

गुज़रे ज़माने के लोगों की

कल के स्मारक उस पर कब्ज़ा नहीं जमा पाये;

लेकिन उस पर उनका हुक्म नहीं चलेगा

जिन्होंने आज उसे तहस-नहस कर दिया

 

कबीले के मांस और ख़ून से पोसे हुए

जंगल का ही हुक्म चलेगा,

आदिम जीवन्तता में सनी हुई

आत्मा ही रह जाएगी;

शहीदों का चुम्बन ज़िन्दा रहेगा

 

गंगा जीवन की धारा रह जाएगी

लाठी और तलवार उसे बचायेंगी

सारा जंगल ख़त्म कर दिये जाने के बाद भी

उसमें छिपी हुई आग रह जाती है

 

लेकिन इंद्रावेल्ली

जिसे अब शहर बना दिया गया

बग़ावत का परचम बनकर रह जायेगा

कल का स्मारक

याददाश्त का संकेत है

 

यह उनके लिये मील का पत्थर है

जिन्होंने उसे बरबाद कर दिया

 

इंद्रावेल्ली ज़िन्दा रहेगा

संघर्ष करती जनता के

शिखर का प्रतीक बनकर

 

 

एक अलग दिन

 

ऐसा नहीं कि मेरा आना बिना सूचना के हो

जो बात कही जानी है हमेशा अनकही रह जाती है

ऐसा नहीं कि अप्रत्याशित घटना हो

लेकिन अनचाहे के अनुकूल होने की तड़प रह जाती है

 

शब्दों का सिलसिला टूटा नहीं

कोशिशें रुक नहीं गई

और हर अनुभव…आधा-अधूरा

 

फिर भी यह समस्या नहीं है

यहां

समय रुक नहीं गया है

समय सिर्फ़ हमसे

अलग हो चुका है

 

हमारा उनींदा इंतज़ार

तारीख का बदलना

कड़वे-मीठे बिलगाव की

लीपापोती है

 

हमारा घरौंदा,

बीस वसंतों का यह बसेरा

परों के घोंसले की गरमाहट

कड़वे यथार्थ में मिटता हुआ…

 

अभी कि जब तुम कहते हो, हाय,

क्या वे तुम्हारा आने वाला कल छीन लेंगे?

आज ही वह दिन है

आज का दिन

 

परेशान

जब तुम अपनी तड़प में छटपटाते हो

हाय, क्या तुम उनकी दखल में होते हो

जबकि तुम देखते होते हो

मैं ज़ंजीरों से बंधा हूं

 

मंज़र,

गिरफ़्तार शब्द

एक टूटे आंसू की तरह

हमारी जवाबी पांत में

झंझरियों के

वृत्तों और चतुष्कोणों को

चीरता हुआ

मैं सिर्फ़ लाचार

ताक ही सकता हूं.

हमें ले जाने वाला वैन गरजते हुए

धूल उड़ाता है.

 

कोई बदबू सी है

अंदर नज़र मोड़कर देखता हूं

राइफ़ल और खाक़ी युनिफ़ार्म

निगरानी में हैं.

 

मेरा वजूद ऐंठता है

पेट्रोल की महक से

मैं बेचैन हूं

मेरी कराहती अंतड़ियों में मरोड़ सी उठती है

बाहरी दुनिया में तुम्हारी ओर से

अपनी नज़रें हटाकर

अपने अन्दर

मैं तुम्हें देखता हूं.

वक़्त के और मेरे सिर्फ़ दो अंग हैं

दिन और रात

तेज़ काम करने की चाहत के साथ

वक़्त सेकंड के कांटे को थाम लेता है

मेरी कलम मुट्ठी में भींची हुई

वह आगे बढ़ता है

और आगे बढ़ता जाता है.

 

उस दुश्मन की चार टांगें हैं

टेलि-कान, टेलि-नज़र, रेडियो-ज़बान

और हथियारों से पंजे.

 

और सबसे बढ़कर,

जीते रहने की लालच

एक अकेला.

 

इसी की वजह से

उसने अपने दिल की हत्या कर दी,

इसी की वजह से वह उसके कंपन का गला घोंटता है.

 

कैसा संवाद

किसी ऐसे के साथ

जिसका दिल ही न हो?

 

शिकारी कुत्ते की जकड़ती ज़बान

उसके गले की पट्टी,

मालिक के कोंचते हाथ में चाबुक,

मातहतों को दखल में लेते हुए.

कौन सी भाषा इस बयान का अनुवाद कर सकती है

कि सोच पर बेड़ी लगाना भयानक अपराध है?

 

दौलत

इन्सानी दुनिया को टुकड़े-टुकड़े कर

रखवालों और अपराधियों में बदल देती है

लेकिन जब मैं ज़ोरदार ढंग से ऐलान करता हूं

कि इसे ख़त्म किया जाय

दौलत का पिंजरा मुझे मुलज़िम कहता है, ठीक है,

लेकिन,

मालिक की नज़र में

मैं एक कम्युनिस्ट हूं

और मानो कि इससे बदतर कुछ भी नहीं

कि वह आरोप लगाता है

नक्सलवादी है

 

ठीक से अमल में लाते हुए इस पर डटे रहो

‘द्रोह’ को हमेशा के लिये जारी रखो

सबकी ख़ातिर


कवि, अनुवादक उज्ज्वल भट्टाचार्य जर्मनी में रहते हैं. उनके द्वारा विश्वकविता से किया गया एक महत्त्वपूर्ण अनुवाद – लम्हे लौट आते हैं – हाल ही में प्रकाशित हुई है. इसके अलावा बैर्तोल्त ब्रेष्ट और एरिष फ्रीड के अनुवाद भी प्रकाशित हो चुके हैं. उनके कुछ अनुवाद आप यहाँ भी पढ़ सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published.