सुशांत सपने और बॉलीवुड

लेब्रिनिथ में बोर्हेस एक क़िस्से के अंत में लिखते हैं – वह रोष भी सच्चा था जिसे उसने बर्दाश्त किया था ; केवल स्थितियाँ ग़लत थीं।

उस क़िस्से में एक साधारण सी स्त्री एम्मा जुन्ज़ एक हत्या कर देती है, इस क़िस्से में असाधारण रूप से प्रतिभाशाली सुशांत सिंह राजपूत ने ख़ुदक़शी कर ली।

सुशांत की मौत के बाद से ही सोशल मीडिया पर एक अजीब सी तनावभरी हलचल बनी हुई है। ख़बरों को सनसनी बनाने की नीच प्रतियोगिता में पतन की सारी गर्त पार कर चुके टीवी चैनलों को फ़िलहाल उनके हाल पर छोड़ दिया जाए तो बेहतर लेकिन सोशल मीडिया पर, खासतौर से फिल्मीजगत के लोगों के बीच जो एक गहमागहमी है उसमें अफ़सोस भी है, दुख भी है, एक डर भी है और अपने हिसाब सेटल कर लेने की कंगना राणावत जैसी शातिरी भी है। भाई-भतीजावाद, गुटबाजी जैसे कितने ही आरोप और तू-तू मैं-मैं के बीच इस अफ़सोस की तमाम छायाएं कि काश एकबार बात कर ली होती।

 

उन्हें चाँद भी चाहिए था और सूरज भी 

फिल्मों और उनकी दुनिया से लगभग पूरी तरह अनजान मेरे जैसे लेखक की निगाह ठहरी एक पोस्ट पर जहाँ उनके पचास सपनों का ज़िक्र था, उन्हें पढ़ता रहा और लगातार सोचता रहा। सुरेन्द्र वर्मा की ‘मुझे चाँद चाहिए’ जब आई थी तो हम जवान हो रहे थे। क़स्बाई वर्षा वशिष्ठ को चाँद की चाहत थी। सूरज उसके किसी काम का नहीं था। चाँद को पाने के लिए वह रात के किसी भी अँधेरे को बर्दाश्त कर सकती थी, किया। सुशांत को चाँद भी चाहिए था, सूरज भी। तारे भी, तेज़ धूप भी, छाँव भी, शाम का रूमानी समन्दर भी, रात की डरावनी सियाही भी और भोर की मद्धम रौशनी भी।

इन सपनों में एकतरफ़ वह एक ओर सारे कोड सीखना चाहते हैं, Laser Interferometer Gravitational-Wave Observatory (LIGO) में जाना चाहते हैं, टेलिस्कोप से Andromeda को एक्सप्लोर करना चाहते हैं, अंटारकटिक जाना चाहते हैं, नासा की एक और वर्कशॉप में शामिल होना चाहते हैं, किताब लिखना चाहते हैं और ऐसी ही तमाम दूसरी चीज़ें, तो दूसरी तरफ़ वह Lamborghini खरीदना चाहते हैं, सिक्स पैक एब्स बनाना चाहते हैं और ऐसी कुछ ख्वाहिशें तो साथ में वह योग भी सीखना चाहते हैं, विवेकानंद पर डॉक्यूमेंट्री बनाना चाहते हैं, बच्चों की नासा भेजने में  मदद करना चाहते हैं, लड़कियों को आत्मरक्षा करना सिखाना चाहते हैं और कैलाश पर मेडिटेशन भी करना चाहते हैं!

और इन सब सपनों के साथ वह बॉलीवुड की चूहादौड़ में आगे निकलने का संघर्ष कर रहे थे!

एक इंटरव्यू क्लिप देख रहा था उनकी जिसमें वह किताबें पढ़ने के शौक़ का ज़िक्र करते हैं तो पूछा जाता है आप fun के लिए क्या करते हैं। थोड़े अकबकाये हुए वह जवाब देते हैं – किताब पढ़ना fun है मेरे लिए। भौतिकी में गहरी रुचि, पढ़ने में fun यह फ़न उनके लिए funny होगा ही जो सुशांत की मौत पर हो रहे शो में भी आईलाइनर की फ़िक्र में रहते हैं।

उन्हें देखते और सोशल मीडिया पर उनका लिखा पढ़ते हुए लगातार लगता है कि वह मिसफिट थे फिल्मी दुनिया में।

आँखों के सपने बनाम बाज़ार की आँखें

एक लड़का जो शानदार छात्र है। जिसने फिजिक्स ओलंपियाड जीता है। जो इंजीनियरिंग एन्ट्रेंस में रैंक ले आता है। जो दिल्ली इंजीनियरिंग कॉलेज जैसे प्रतिष्ठित संस्थान मे पढ़ रहा है। जो नासा की वर्कशॉप कर चुका है। वह एक दिन उठता है और मुंबई जाकर बैक स्टेज डांस करने लगता है! पैशन कहकर इसे सामान्य बताया जा सकता है। लेकिन यह सिर्फ़ पैशन नहीं है। बाज़ार द्वारा सफलता की बदल दी गई परिभाषा का युवा पीढ़ी के मानस पर गहरा असर है।

कल्पना करके देखिए – सुशांत इंजीनियरिंग करने के बाद किसी शानदार संस्थान से रिसर्च करते। वैज्ञानिक बनते। प्रयोगों मे गहरे डूब जाते। संभव है वह Lamborghini नहीं खरीद पाते उम्र भर, अखबारों के तीसरे पन्ने पर उनकी ख़ूबसूरत तस्वीरें न होतीं लेकिन होती उनके पास एक सार्थक ज़िंदगी। अपने उस पैशन को जीने की संतुष्टि जो शायद वास्तविक था, जिसके लिए वह बने थे। भाई-भतीजावाद, ओछी राजनीति वगैरह सब वहाँ भी मिलते, आउटसाइडर वह वहाँ भी होते लेकिन वहाँ वह संघर्ष कर पाते क्योंकि कोई किताब पढ़ने के लिए उनका मज़ाक नहीं उड़ाता, वहाँ उनके शौक़ साझा होते तो दोस्त भी होते। वह उनकी दुनिया होती।

मुझे इरफ़ान याद आ रहे हैं। साधारण शक्ल-ओ-सूरत के एक पीढ़ी पुराने एक्टर। वह एक्टिंग के लिए ही बने थे तो एन एस डी गए फिर मुंबई। टीवी सीरियल भी किए। वर्षों गुमनामी के अँधेरे में भटकते रहे। झेला यह सब उन्होंने भी होगा। आउटसाइडर तो थे ही, किसी अरबपति की औलाद भी नहीं थे और वैसे ही एक क़स्बे से आए थे। लेकिन उन्हें अभिनय के अलावा कुछ नहीं चाहिए था। उनका ख्वाब स्टार वाला नहीं था। मिली सफलता। किया काम और मस्त रहे। चाँद चाहिए था उन्हें तो सूरज का रास्ता ही नहीं देखा। लेकिन मुझे लगता है सुशांत को चाँद चाहिए था और सूरज की रौशनी से मदहोश रहे।

दुनिया में सब नहीं मिलता। मुझसे कई लोगों ने कहा आपको फिल्मों के लिए लिखना चाहिए। जितना सारी उम्र लिखकर यहाँ कमा पाऊँगा उतना एक-दो फिल्मों से कमा लूँगा। मैं जानता हूँ कि मैं लिख सकता हूँ। एक उम्र के बाद इतना आकलन हो जाता है अपना भी। लेकिन उस रेस में मुझसे दौड़ा नहीं जाएगा। वह नहीं है मुझमें। मैं बना नहीं उसके लिए। किसी प्रोड्यूसर को कहानी नहीं सुना पाऊँगा। इसलिए मैं नहीं जाऊँगा वहाँ। प्रेमचंद लौट आए थे। रह गए होते तो शायद प्रेमचंद नहीं हो पाते और वह प्रेमचंद बनने के लिए बने थे। प्रेमचंद की ग़रीबी गरबीली थी, अमीरी पीड़ाभरी होती बम्बई की शायद। बाज़ार आँखें चकमका देता है, उनके सपने तक बदल देता है। सुशांत जैसा एक प्रतिभाशाली और मेहनती युवा पा तो मुंबई मे भी एक मुकाम जाता है लेकिन उसे टॉप पर रहने की जो आदत है और सफलता की जैसी कल्पना उसकी राह उन राहों से अलग है जिस पर चलना सीखा है उसने।

जिस कहानी से शुरू किया था मैंने उसमें एम्मा ने अपने पिता के हत्यारे की हत्या की थी। जब वह पिता के हत्या के बदले को एक फर्ज़ की तरह करना चाहती तो नहीं कर पाती। लेकिन जब वह उस हत्या के चलते भोगी हुई अपनी पीड़ा को याद करती है तो एकदम सहजता से मार देती है उसे।

सफलता वह पाने मे है जो हम पाना चाहते हैं। वह एक अच्छी कहानी लिख देने भर का छोटा सा सुख हो सकता है। इस सुख के लिए भोगी पीड़ा ताक़त देती है। बाज़ार की आँखों से देखे सपने सफलता का भरम पैदा करते हैं। उन्हें पाने में भोगी पीड़ा असह्य होती है शायद। कुंभनदास नहीं जा सकते थे दरबार में उनके लिए बादशाह के सामने झुकना असह्य पीड़ा थी। केशव दरबार से बाहर नहीं जा सकते थे क्योंकि दरबार से मिली ताक़त के बिना उनकी सफलता अधूरी थी। कुंभनदास की केशव बनने की कोशिश आत्मघाती हो सकती थी..

 

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.