मैं उनका नालायक़ बेटा था : फादर्स डे पर

पापा को कभी हैप्पी फादर्स डे नहीं बोला हाँ वह साथ होते तो दिन खूबसूरत हो जाते थे।

 

वह मेरे हीरो नहीं थे, पिता थे जैसे सबके होते हैं। एक कहानी उनकी भी थी जैसी सबकी होती है। सरयू किनारे दियारे के एक छोटे से गाँव में जन्मे पिता के पिता ने बिजली विभाग में छोटी सी नौकरी करते हुए इतना समझ लिया था कि शिक्षा ही उनके परिवार को मुक्ति दिला सकती है तो पूरी सख्ती से अपने बच्चों को उस ओर मोड़ दिया।

उन दिनों की मुश्किलात बस एक कहानी से समझ आ जाती है। नदी पार करके जाते थे पापा और बड़े चाचा पढ़ने। एक बार लौटते हुए नाव भँवर में फँस गई। इस पार से किसी ने देखा और ख़बर गाँव पहुँची तो पापा के बाबा पागल हो गए जैसे। रोना-पीटना मच गया। नाव बच निकली थी और जब चार कोस पैदल चलकर लौटे दोनों भाई तो जैसे उस ढहते घर को नया सहारा मिला। पापा अपने बाबा की बहुत सी कहानियाँ सुनाते थे। हर साल आने वाली बाढ़ से बचाव के लिए बन रहे बंधे के मेठ थे सरयू पांडे। धनी नहीं लेकिन इलाक़े में खूब मक़बूल। पापा के साथ वही नदी पार करके गाँव जाता पैदल तो रास्ते में मिलने वाले कई लोग अब भी उन्हें सरयू पांडे क नाती कहकर बुलाते। पापा उन्हें जयशंकर प्रसाद की आँसू सुनाया करते थे। पापा मुझे उन्हीं पगडंडियों पर निराला और बच्चन की कविताएं सुनाया करते। कामायनी तो ज़बानी याद थी उन्हें।

खैर पापा ने भौतिकी चुना और गोरखपुर से एम एससी की। उन्होंने कभी नहीं कहा लेकिन उनके दोस्त और मेरे इंटरमीडिएट के शिक्षक होरा अंकल ने एकबार अकेले में कहा था –‘तुम नहीं समझोगे अशोक। अवधेश एमएससी में था, टॉपर था लेकिन पैंट सिला नहीं पाया कभी। पाजामे और शर्ट में आता था यूनिवर्सिटी।‘ समझा मैंने लेकिन बहुत बाद में जब ढाई हज़ार की शर्ट गिफ्ट करने पर हंस के उन्होंने कहा – इतने में तो पाँच बन जातीं। नौकरी के बाद भी कर्ज़ मे डूबे पिता और चार छोटे भाई-बहनों की पढ़ाई तथा शादी ब्याह की जिम्मेदारी हमसे पहले मिल गई थी उन्हें।

वह एक शिक्षक थे। सबसे पहले और सबसे अंत में भी। 19 साल की उम्र में देवरिया के उस डिग्री कॉलेज में लेक्चरर हुए तो फिर सारी ज़िंदगी सिर्फ़ पढ़ाया। उनके सैकड़ों-हजारों विद्यार्थी मुझसे अधिक जानते हैं उन्हें। इतने शिक्षक थे वह कि जब प्रिंसिपल हुए तो कहते थे – यार ये सब मेरा काम नहीं। मुझे तो पढ़ने-पढ़ाने मे ही मजा आता है।

मैने तो जब देखा उन्हें किताबों मे ही देखा। सफ़ेद पाजामा, आधी बाँह की बनियान और मोटा चश्मा लगाए घर के किसी कोने में किताबों मे डूब सकते थे वह। जून की गर्मी में लाइट चली जाए तो बस ऊपर देखकर कहेंगे, आ जाएगी, और फिर डूब जाएंगे किताब में।

मैं उनका नालायक बेटा ही साबित हुआ। छोटा भाई बचपन से डॉक्टर बनना चाहता था। पापा ने पूरे उत्साह से मेहनत की उसके साथ। जब बारहवीं के साथ ही उसने मेडिकल इंटरेंस के लगभग सारे एक्जाम निकाल लिए तो उत्साह और गर्व से भरा उनका चेहरा देखकर प्यार आता था। मुझे इंजीनियर और फिर आई ए एस बनाना चाहते थे। मेरा मन रमता था साहित्य, इतिहास और सामाजिक गतिविधियों में। समझाते मुझे लेकिन मैंने चुन ली थी अपनी दुनिया। मैं उनसे बहुत प्यार करता था लेकिन उनके जैसा नहीं बनना चाहता था.. वर्षों अबोला भी रहा। कब तक रहता..

खुश होते थे कहीं कुछ छपा देखते तो। कविताएं पढ़ते सलाह देते। पर्यटन का ग़ज़ब शौक था और फोटोग्राफी का। जून की दोपहरी में दतिया के महल की सबसे आखिरी सीढ़ी चढ़ कर छत से मुझे चुनौती देती उनकी आवाज़ अब भी गूँजती है कानों में। देश का कोना-कोना घूम आए थे। अकेले कभी नहीं गए, जहाँ गए माँ के साथ। सैकड़ों ब्लैक एंड व्हाइट फ़ोटो बिखरे हैं माँ के एल्बम में उन यादों के।

राजनीति में बहुत रुचि नहीं थी लेकिन एक बात उनकी बहुत गहरे याद रह गई है।

इंदिरा गाँधी की बहुत आलोचना होती उन दिनों। हम बच्चे थे तो सुनते थे सब। जब हत्या हुई उनकी तो ख़बर मिली और भागते हुए घर गया और खुशी से बताया उन्हें। वह उदास बैठे थे। घूर के देखा और बोले – किसी के मरने पर खुश नहीं होते बेटा। प्रधानमंत्री थीं हमारी।

बहुत बाद में जब गोधरा के बाद दंगे हुए तो मैं वहीं था। फोन पर उनकी टूटी हुई आवाज़ थी – हम तो मरने के बाद लाश जलाते हुए रोते हैं ये कौन से हिन्दू हैं जो ज़िंदा लोगों को जला कर खुश हो रहे हैं।

अलग लोग थे वे जिनकी प्रतिबद्धताएं राजनीतिक नहीं मनुष्यता के प्रति थीं। उन्होंने यह देश बनाया था जिसे नष्ट करने की कोशिशें हरतरफ़ जारी हैं।

उस रात भी वह पढ़ रहे थे। बारह बजे किताब में बुकमार्क की जगह चश्मा लगाकर सोये थे उस रात भी। बस उस रात की सुबह नहीं हुई। नींद मे ही फट गईं दिमाग की नसें। हमने बहुत कोशिशें कीं लेकिन वह अपना फ़ैसला सुना चुके थे। जिस नदी को उनके साथ पार किया करता था उसी के घाट पर छोड़ आया उन्हें। पुरखों की मिट्टी मे मिट्टी मिल गई गंध मे गंध।

कश्मीरनामा आई तो सबसे पहले उनकी याद आई। होते तो देखता घर के किसी कोने में चश्मे के भीतर उनकी आँखों की चमक। कौन जाने इस नालायक़ पर भी गर्व कर पाते शायद वह..

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