अतुल की दो कविताएँ

अतुल की कविताएँ साहित्य की घेराबंदी की बाहर की कविताएँ हैं जो सबसे पहले अपने अनमनेपन के चलते ध्यान खींचती हैं. वह अनमनापन जहाँ चमकीले शब्दों और मुहाविरों के प्रति मोह का सीधा विलोम है. भाषाविज्ञान का शोधार्थी अतुल कवि कहलाने के लिए उत्सुक युवाओं की भीड़ से ख़ुद को इतना अलग करके रखता है कि बहुत कम लोग उसके कविरूप से परिचित होंगे. बहसों में वाचाल और बातचीत में चुप्पा इस युवक में संभावनाएं कविता के भीतर और बाहर दोनों हैं – देखना है वह कौन सी राह चुनता है.

इस पोस्ट के साथ हम असुविधा की टूटी हुई कड़ी को फिर जोड़ रहे हैं. अगर आपको लगता है कि आपकी कविता/कहानी/लेख होने चाहिए तो आमन्त्रण की प्रतीक्षा किये बिना मेल कीजिये – ashokk34@gmail.com पर 

 

कनविनिएंस 

 

तटस्थ होना मुर्दा होना नहीं है।

अगर तुम सोचते हो

कि तुम चुप रहकर

एक लाश की खाल ओढ़ लोगे,

तो तुम्हें झांसा दे रही है

तुम्हारी चुप्पी

क्यूँकि लाशें अक्सर बोलती है

और माँगती हैं इंसाफ,

अपने और दूसरों के लिए।

 

तटस्थ होना गूँगा होना नहीं है।

गूंगा भींचता है मुट्ठियाँ अपनी,

और जकड़ लेता है

ज़ुल्मी के हथियार

नोच लेता है माँस चेहरों से

और धँसा देता है उनमें नुकीले नाख़ून।

 

तटस्थता होती है एक लाश

जिसकी ज़बान चिपकी है

मरने के बाद भी।

 

और आवारा पड़ी है एक कोने में,

चाहती है

कोई सुध ले उसकी

और गिने उसकी प्रेम कहानियाँ

जो तटस्थ थीं, या चुटकुले

जिसमें उसने हँसी की थी

एक गरीब की,

एक लड़की की,

एक सरदार की,

एक चींटी की, एक चूहे की।

 

मगर लोगों तक आती है

केवल एक भयानक दुर्गन्ध,

लोटते हैं उसके शरीर में

कुछ बैक्टीरिया

बिल्कुल वैसे ही जैसे लोटे थे

हिटलर की चमड़ियों पे,

ग्वेरा के कटे हाथ के टुकड़े पे

या बिना भोजन के दम तोड़ते

फोटू खिंचाते, बे-माँस बदन पे।

 

तटस्थ होना एक बजबजाती लाश का बैक्टीरिया होना है।

 

 

निर्वेद 

 

रेत के स्वाद से दिनों में महीन खुरदुरी

सी रातें, किवाड़ बन्द कमरे में

गूँजता, एक नितांत अकेलापन

खुली खिड़की से अचानक से आती कोई तेज हवा

और झुलसा जाता मन चिमनी के भीतर रेंगता

जबान पर आते आते अटक जाता

वो मनबढ़ सा गाना और

किसी और पल में

किसी और गाने के बीच अड़ा देता अपनी टाँग

जैसे किसी बेकार पड़े म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट

के तारों सा उलझा जीवन,

 

तीलियाँ, चारों तरफ बिखरी पड़ी

किसी पानी के सोते में डूब कर गीली

जलने की कहानी के हिस्सों से दूर

दुनिया लहकाने-भभकाने के संगीत से और दूर

कि जैसे किसी बजते हुए ‘ट्रम्पेट’

की ‘जिनपिंग’ से ठंडी अनबन

घरों की दीवारों पे चिपके वायरस के ख़याल के अलावा

चश्मदीद पान के धब्बे

 

जैसे मानव की आदिमानव पे चस्पा सेमी/सूडो-विज़िबल सभ्यता की खाल

जहीन-महीन नुस्खों में साँस टिकाने

और मनुष्यता बचाने की जिरह में

उलझती एक सनकी डाक्टरनी

या ख़ामख़ा कुछ देनदारी से ग़रीब बचा पाने

की कवायद में जूझता वो नक्सल अर्बन

जैसे होठों की चिमनियों में धुँए से इकट्ठा

होती एक गर्द गर्दन के पिछले हिस्से में, वैसे

किन्हीं कमरों में कैद एक कहानी

इकट्ठा करती अवसाद में गहरे डूबे क्षण–

 

बजाय धम्म से आवाज कर गिरने के

आसमान के सब तरफ से उतरती मौत की ख़बरें

मानो बिना चीनी-अदरक की काली चाय जीभ पे फैलते हुए

घूँट-घूँट उतरती, आहिस्ता

आहिस्ता।
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