नेहरू-पटेल और कश्मीर

पाकिस्तान मान के चल रहा था कि कश्मीर उसके हाथ लगेगा.

इसके कई कारण थे. पहली बात तो यह कि एक मुस्लिम बहुल प्रदेश का पाकिस्तान के साथ जाना उन परिस्थितियों में सामान्य सी बात थी । आख़िर हिन्दुस्तान – पाकिस्तान का बँटवारा इसी आधार पर हुआ था ।

कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमन्त्री राम चन्द्र काक लगातार पाकिस्तान के सम्पर्क में थे और पाकिस्तानी प्रशासन उन्हें प्रलोभन दे रहा था ।[i] भौगोलिक लिहाज़ से भी देखें तो कश्मीर के दो प्रमुख सम्पर्क मार्ग थे  वाया लाहौर, रावलपिंडी और मुरी से होकर मुज़फ़्फ़राबाद तथा श्रीनगर और सियालकोट, जम्मू तथा बनिहाल दर्रे से होकर श्रीनगर थे । एक तीसरा रास्ता गुरुदासपुर से था जो बेहद टूटा फूटा था । लाहौर और सियालकोट का पाकिस्तान में जाना तय था । ऐसे में बस गुरुदासपुर से जाने वाला रास्ता ही बचता था । जनसंख्या के लिहाज से गुरुदासपुर पर भी पाकिस्तान का हक़ बन सकता था ।

नेहरू इस बात के महत्त्व को समझते थे और उनकी कोशिशें ही थीं कि अंततः रावी के सहारे गुरुदासपुर को दो हिस्सों में कुछ इस तरह बाँटा गया कि कश्मीर से सम्पर्क का मार्ग भारत में रहे ।[ii] लेकिन जहाँ नेहरू कश्मीर को भारत में शामिल कराने के लिए बेहद व्यग्र थे, सरदार पटेल शुरू में इसके ख़िलाफ़ थे या कम से कम बहुत उत्साहित नहीं थे ।[iii] कश्मीर के मुस्लिम बहुल होने के कारण पटेल मानते थे कि उसे पाकिस्तान को दे दिया जाना चाहिए लेकिन नेहरू का भरोसा जनता पर और इस रूप में कश्मीर के निर्विवाद जननेता शेख़ अब्दुल्ला पर था ।  कश्मीर उनके पुरखों की ज़मीन थी और उससे उनका गहरा लगाव तो था ही साथ में एक मुस्लिम बहुल इलाक़े का भारत में शान्ति और बराबरी से रहना उनके सेक्युलरिज्म के दावे के लिहाज़ से भी बेहद महत्त्वपूर्ण था ।

नेहरू की चेतावनी 

17 जून 1947 को लिखे एक लम्बे नोट में उन्होंने यह भरोसा जताया था कि कश्मीरी जनता शेख़ अब्दुल्ला और नेशनल कॉन्फ्रेंस के चलते भारत में विलय के पक्ष में होगी जबकि मुस्लिम लीग और उसकी समर्थक मुस्लिम कॉन्फ्रेंस का घाटी में कोई प्रभाव नहीं है ।[iv] एम जे अकबर ने बहुत विस्तार से तथ्य दिए हैं जिनके अनुसार पटेल और उनके सचिव मेनन ने जहाँ बाक़ी रियासतों को भारत में शामिल करने के लिए अथक परिश्रम किया और हर तरह के दबाव की नीति अपनाई[1] वहीं 15 अगस्त 1947 के बाद भी क़बायली हमले के पहले तक हरि सिंह पर भारत में शामिल होने के लिए कोई दबाव बनाने की कोशिश नहीं की गई जबकि नेहरू ने बार-बार चेताया था । बलराज पुरी ने नेहरू का एक पत्र उद्धृत किया है जो भविष्यवाणी जैसा लगता है । इसमें  नेहरू कहते हैं-

पाकिस्तान की रणनीति अब घुसपैठ की है और जाड़ों के चलते कश्मीर के अलग-थलग पड़ जाने की स्थिति आते ही वह कोई बड़ी कार्यवाही कर सकता है…राजा के पास अब एक ही रास्ता बचा है कि वह नेशनल कॉन्फ्रेंस का सहयोग माँगें और भारत के साथ विलय करें, यह पाकिस्तान के लिए बिना भारत से सीधे टकराव की स्थिति आये आधिकारिक या अनाधिकारिक आक्रमण करना मुश्किल कर देगा ।[v]

लेकिन पटेल अनिच्छुक थे 

लेकिन नेहरू की इस व्यग्रता के बरक्स शुरूआती दौर में पटेल की अनिच्छा आश्चर्यजनक थी । एम जे अकबर ने  माउंटबेटन के हवाले से “सड़े सेबों” का एक क़िस्सा सुनाया है जिसमें वह माउंटबेटन से कहते हैं कि मुझे सभी 565 (उस समय भारत में रजवाड़ों की संख्या) सेब चाहिए लेकिन माउंटबेटन के यह कहने पर कि अगर मै कुछ वापस लेना चाहूं तो, वह कहते हैं कि हम 560 से भी काम चला लेंगे । कश्मीर इन्हीं 5 “सेबों” में से था । शायद इसीलिए 1947 के बाद जवाहरलाल द्वारा बार-बार यह ध्यान दिलाये जाने पर कि पाकिस्तान कश्मीर पर कब्ज़ा करने के लिए कोई चाल चल सकता है, पटेल ने कोई तवज़्ज़ो नहीं दिया । इस संदर्भ में उनके सचिव वीपी मेनन पर्याप्त इशारा करते हैं-

पाकिस्तान ने एक स्टैंड स्टिल समझौता किया । लेकिन हम इसके प्रभावों को समझने के लिए वक़्त चाहते थे । हमने राज्य को उसके हाल पर छोड़ दिया । हमने महाराजा से विलय के लिए नहीं कहा जबकि उस समय (विभाजन के बाद) रेडक्लिफ अवार्ड के बाद राज्य सड़क मार्ग से हिन्दुस्तान से जुड़ गया था । जनसंख्या के संघटन के चलते वहाँ की अपनी विशिष्ट समस्याएं थीं । यही नहीं, हमें पहले ही काफी कुछ मिल चुका था और अगर सच कहूँ तो मेरे पास कश्मीर के बारे में  सोचने का वक़्त ही नहीं था ।[vi]

 

यहाँ तक कि जब महाराजा ने क़बायली हमले के बाद विलय पत्र का प्रस्ताव भेजा तो भी पटेल का कहना था कि “हमें कश्मीर के मामले में नहीं उलझना चाहिए । पहले ही हमारे पास काफ़ी राज्य हैं ।”[vii] उस दौर में माउंटबेटन के सहयोगी रहे एलेन कैम्पबेल ने अपनी किताब “मिशन विथ माउंटबेटन” में लिखा है कि “सरदार वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में  राज्यों से सम्बन्धित मंत्रालय ने अपनी सीमा से बाहर जाकर ऐसी कोई कार्यवाही नहीं की जिससे यह लगे कि कश्मीर को भारत से जोड़ने के लिए कोई दबाव बनाया जा रहा है और पाकिस्तान को यह स्पष्ट सन्देश दिया गया कि अगर कश्मीर उसके साथ जाता है तो भारत को कतई बुरा नहीं लगेगा ।[viii] विडम्बना ही है कि आज कश्मीर को लेकर नेहरू को बार-बार कटघरे में खड़ा किया जाता है और कहा जाता है कि अगर पटेल की चलती तो कश्मीर में कोई समस्या नहीं होती, लेकिन अगर इस बिंदु पर पटेल की चलती तो शायद कश्मीर कभी भारत का हिस्सा नहीं होता ।

 

यहाँ एक और तथ्य जान लेना बेहतर होगा कि उस समय तीन रियासतें ऐसी थीं जहाँ जनसंख्या के बहुलांश और शासक का धर्म अलग-अलग था हैदराबाद, जूनागढ़ और कश्मीर । जूनागढ़ और हैदराबाद ।[2] दोनों के शासकों ने पाकिस्तान में विलय की कोशिशें की थीं और पाकिस्तान को उनका पूरा समर्थन मिला था । हैदराबाद जैसा भारतीय सीमा के बीच में अवस्थित राज्य अगर पाकिस्तान से मिलता तो यह भारतीय शासन के लिए हमेशा का एक सरदर्द होता । यही बात कमोबेश जूनागढ़ के लिए भी कही जा सकती है जहाँ अंततः जनमतसंग्रह हुआ और जनता ने भारत के पक्ष में  वोट दिया ।

पटेल इन राज्यों को हर हाल में भारत में शामिल करना चाहते थे और इसके बदले कश्मीर को पाकिस्तान को देना उचित लगता था । जूनागढ़ की परिघटना कश्मीर के संदर्भ में  बेहद महत्त्वपूर्ण है और इस पर आगे भी बात करेंगे । इसी तर्कप्रणाली को आगे बढ़ाते हुए उस समय के सबसे प्रभावी अंग्रेज़ी अख़बार द स्टेट्समैन के सम्पादक इयान स्टीफेंस ने क़बायली हमले के चलते महाराजा के विलयपत्र पर हस्ताक्षर के तुरंत बाद भारतीय सेना के कश्मीर में प्रवेश का विरोध करते हुए 28 अक्टूबर 1947 को लिखे अपने बेहद महत्त्वपूर्ण सम्पादकीय “ख़तरनाक चालें” में कहा

“इस अस्वाभाविक उलझन का तार्किक निष्कर्ष तो यह होना चाहिए था कि जूनागढ़ के शासक को और उचित समय में हैदराबाद के शासक को भारतीय संघ में शामिल होने के लिए मन बनाना चाहिए था और कश्मीर को पाकिस्तान में शामिल होने के लिए ।”[ix]

 

इस सम्पादकीय में  शेख़ अब्दुल्ला, कश्मीर के जनांदोलन और नेशनल कॉन्फ्रेंस के रुख की कहीं कोई चर्चा नहीं है । न ही इस सवाल का जवाब ढूँढने की कोई कोशिश कि आज़ादी की लड़ाई के दौरान मुस्लिम लीग से दूर और कांग्रेस के क़रीब रहकर लगातार जनपक्षधर और ग़ैर साम्प्रदायिक रुख अपनाते हुए कश्मीर में जनता का सबसे अधिक समर्थन हासिल करने वाले संगठन के इस ऐतिहासिक संघर्ष को दरकिनार कर कश्मीरी जनता में कभी भरोसा न जगा पाए मुस्लिम कॉन्फ्रेंस जैसे साम्प्रदायिक दलों की बात मान लेना किस नैतिक आधार पर सही होगा ?

नेहरू का दोष 

इस पर हम आगे बात करेंगे लेकिन इस बिंदु पर ज़ाहिर है कि साम्प्रदायिक आधार पर हुए विभाजन में जनता की इच्छाएँ नहीं साम्राज्यवादी योजनायें महत्त्वपूर्ण हो गई थीं । नेहरू का दोष यह नहीं था कि वह कश्मीर के भारत में विलय से पहले और बाद में भी जनता की इच्छाओं का आदर करने की बात करते रहे, बल्कि वह वहाँ से शुरू होता है जब वह जनता की इच्छाओं को राष्ट्र की वृहत्तर योजनाओं के सम्मुख पीछे छोड़ देते हैं ।

जनसंघ और हिन्दू संगठन भारत नहीं राजा के साथ थे

यहाँ रुककर हम कश्मीर में  नेशनल कॉन्फ्रेंस सहित कश्मीर में सक्रिय अन्य राजनीतिक ताक़तों के रुख को भी देख लेते हैं । शेख़ अब्दुल्ला इस बात को लेकर बहुत स्पष्ट थे कि बड़ी ताक़तों से घिरे एक छोटे से देश के लिए अपनी आज़ादी बरक़रार रख पाना लगभग असंभव था । यह तभी संभव था जब दोनों ताक़तें एक स्वतंत्र कश्मीर के लिए सहमत हों और उसकी स्थिरता की गारंटी दें । यही नहीं, भारत और पाकिस्तान के साथ विलय का सवाल उनके लिए साम्प्रदायिक सवाल नहीं था । उनकी स्पष्ट मान्यता थी कि मुस्लिम लीग पर हमेशा ही सामन्ती ताक़तों का प्रभुत्व रहेगा । ऐसे में “नया कश्मीर” का दर्शन पाकिस्तान के साथ मिलकर कभी फलीभूत नहीं हो सकता था जबकि एक सेक्यूलर और लोकतांत्रिक भारत में इसे लागू करना संभव था ।[x]

वहीं, भारतीय जनसंघ के पहले अवतार तत्कालीन आल जम्मू एंड कश्मीर राज्य हिन्दू सभा ने मई 1947 में महाराजा के प्रति अपनी निष्ठा दुहराते हुए एक प्रस्ताव में कहा –

“हम महाराजा के पूरी तरह साथ हैं । वह विलय के मुद्दे पर जो कर रहे हैं या करेंगे, हम पूरी तरह उसके समर्थन में  हैं ।”

इसी महीने में आल जम्मू एंड कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस के कार्यकारी अध्यक्ष चौधरी हमीदुल्ला ख़ान ने भी ऐसा ही रुख अपनाते हुए कहा कि

“महामहिम तुरंत कश्मीर को तुरंत आज़ाद घोषित कर देना चाहिए और राज्य का संविधान बनाने के लिए एक नई संविधान सभा का गठन करना चाहिए ।” उन्होंने एक आज़ाद और लोकतांत्रिक कश्मीर के पहले संवैधानिक प्रमुख के रूप में महाराजा को मुस्लिम समुदाय के पूर्ण सहयोग और समर्थन का आश्वासन देते हुए कहा कि अगर पाकिस्तान सरकार कोई आक्रमण करती है तो राज्य के मुसलमान पाकिस्तान के ख़िलाफ़ हथियार लेकर खड़े होंगे और अगर ज़रूरत पड़ी तो भारत की मदद भी ली जायेगी ।[xi]

इस बयान से साफ़ लगता है कि पाकिस्तान के आक्रमण की संभावना हवाओं में थी ।साथ ही यह भी स्पष्ट है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस के अलावा इस समय तक कश्मीरी राजनीति का कोई भी हिस्सा भारत से विलय के लिए उत्साहित नहीं था । इस समय तक तो मुस्लिम कॉन्फ्रेंस भी पाकिस्तान के साथ विलय को लेकर कतई उत्साहित नहीं थी ।

बलराज पुरी बताते हैं कि उस दौर में भारत का समर्थन करने वालों को, जिनमें वह ख़ुद शामिल थे, हिन्दू कट्टरपंथी धड़ा हिन्दू विरोधी और ग़द्दार कह कर बुलाता था ।

भारत से विलय और शेख़ अब्दुल्ला की रिहाई की माँग करने वाले मुल्कराज सराफ द्वारा संपादित अख़बार रणबीर पर जून के महीने में  पाबंदी लगा दी गई ।[xii] चित्रलेखा जुत्शी सहित कई लोग न केवल कश्मीर छोड़ो आन्दोलन को असफल बताते हैं बल्कि उनका दावा है कि उस समय शेख़ की लोकप्रियता बहुत कम हो गई थी । मुस्लिम लीग भी लगातार यह दावा कर रही थी । लेकिन वास्तविकता लाहौर से निकलने वाले प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार ‘द डॉन’ की 30 अक्टूबर 1946 को अभिव्यक्त इस कुंठा से ज़ाहिर होती है – शेख़ अब्दुल्ला ने जनता पर अपने प्रभाव का ग़लत इस्तेमाल किया ।[xiii]

क्या हिन्दू शासक भारत में विलय के पक्ष में थे?

ऐसा मान लेना भूल होगी कि हिन्दू रजवाड़े भारत में ख़ुशी ख़ुशी विलय के लिए तैयार हो गए थे. ज़्यादातर रजवाड़ों की पहली चिंता अपने अस्तित्व और प्रभाव को बचा लेने की थी. ज़ाहिर था कि पाकिस्तान ने अपनी ओर से आकर्षक प्रस्ताव दिए ही थे. त्रावणकोर के दीवान सर सी पी रामास्वामी अय्यर ने तो पाकिस्तान के साथ एक व्यापारिक समझौता भी कर लिया था जिसका सावरकर ने खुला समर्थन किया था. इस संदर्भ में एक क़िस्सा जान लेना रोचक भी होगा और उस समय के हालात का एक बयान भी –

जोधपुर के महाराजा हनवंत सिंह को जिन्ना ने बढ़िया ऑफर दिया था कि अगर वे पाकिस्तान में विलय का प्रस्ताव मान लेते हैं तो उन्हें पूरी आजादी और संपत्ति की सुरक्षा दी जाएगी। इधर भारत ने दबाव बनाया। मेनन गए जोधपुर विलय पत्र पर साइन कराने। महाराजा आये लाव लश्कर के साथ। एक बड़ा सा शाही पेन। फिर जब साइन करने का वक़्त आया तो खुली पेन निकली बंदूक। मेनन पे तान दी। नहीं माननी तुम्हारी बात। नहीं मिलना भारत से। मेनन हंसे । सेना का पूरा लश्कर था उनके पास। कहा बच्चों वाली हरक़त न कीजिये महाराज। ख़ैर हुए हस्ताक्षर।

माउंटबेटन ने सुना तो कहा – भाड़ में जाये। (पेज़ नंबर 99-100, कश्मीर बिहाइंड द वेल, एम जे अकबर)

 

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कश्मीरनामा 

कश्मीर और कश्मीरी पंडित 

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[i]देखें, पेज़ 46, टू नेशंस एंड कश्मीर, लार्ड क्रिस्टोफ़र बर्डवुड, रॉबर्ट हेल लिमिटेड, लन्दन-1956

[ii]देखें, पेज़ 98-99, कश्मीर बिहाइंड द वेल, एम जे अकबर, रोली बुक्स, दिल्ली, छठा संस्करण- 2011

[iii]देखें, पेज़ 60, बियाण्ड हेडलाइंस, कुलदीप नैयर, रोली बुक्स, दिल्ली-2012

[iv]देखें, पेज़ 109, कश्मीर : अ डिस्प्यूटेड लेगेसी, एलिएस्टर लैम्ब, 1846-90, रॉक्सफोर्ड बुक्स, हर्टफोर्डशायर- 1991

[v]देखें, पेज़ 7, कश्मीर आफ़्टर इंसरजेंसी, बलराज पुरी, ओरियेंट लाँगमैन प्राइवेट लिमिटेड, तीसरा संस्करण-2008, दिल्ली

[vi]देखें, पेज़ 355, इंटीग्रेशन ऑफ़ द इन्डियन स्टेट्स, वी पी मेनन, ओरियेंट ब्लैक्स्वान, दूसरा संस्करण- 2016,  दिल्ली

[vii]देखें, पेज़ 60, बियाण्ड हेडलाइंस, कुलदीप नैयर, रोली बुक्स, दिल्ली-2012

[viii]देखें, पेज़ 261, मिशन विथ माउंटबेटन, एलन कैम्पबेल जॉनसन, जैको पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली -1951

[ix]देखें, पेज़ 183-84, बीइंग द अदर : द मुस्लिम्स इन इण्डिया, सईद नक़वी, अलिफ़ बुक कम्पनी, दिल्ली – 2016

[x]देखें, पेज़ 83, फ्लेम्स ऑफ़ चिनार, शेख़ अब्दुल्ला (अनुवाद – खुशवंत सिंह), पेंगुइन- दिल्ली- 1993

[xi]देखें, पेज़ 5, कश्मीर आफ़्टर इंसरजेंसी, बलराज पुरी, ओरियेंट लाँगमैन प्राइवेट लिमिटेड, तीसरा संस्करण-2008, दिल्ली

[xii]देखें, वही, पेज़ 6

[xiii]देखें, पेज़ 16, द स्ट्रगल फॉर कश्मीर, माइकल ब्रेखर, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, लन्दन-1953

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