कश्मीरी पंडित सरपंच की हत्या पर इतनी चुप्पी क्यों है?

दक्षिण कश्मीर के लुकबान गाँव के सरपंच अजय पण्डिता की हत्या की ख़बर थोड़ी पुरानी हो गई है.

कश्मीर में हत्याएं इतनी आम हैं कि ख़बरें पुरानी हो ही जाती हैं. राहुल गाँधी के ट्वीट के अलावा कांग्रेसियों में कोई ख़ास हलचल नहीं दिखी तो  कश्मीरी पंडितों का राग लगातार अलापने वाली भाजपा के भी किसी बड़े नेता का कोई बयान सामने नहीं आया. ट्विटर पर हिन्दू मुस्लिम खेल चला थोड़ा-बहुत लेकिन इसके आगे कुछ नहीं. यह त्रासदी है कश्मीर की जहाँ जान इतनी सस्ती है कि किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता.

कई लोग आश्चर्यचकित थे कि कश्मीर में अब भी कश्मीरी पंडित हैं!

अपनी किताब कश्मीर और कश्मीरी पंडित’ में मैंने वहाँ रह रहे कश्मीरी पंडितों की कहानी कहने की कोशिश की है. श्रीनगर के भीतर और बाहर रहने वाले अनेक पंडितों से मिला. एक माइक्रो मिनिस्क्यूल माइनारिटी के रूप में अदृश्य हैं वे, लेकिन हैं. खैर अभी बात इस हत्या की.

 

 

 

स्थानीय निकाय चुनाव : बिना जनता का लोकतंत्र 

कश्मीर में स्थानीय निकाय के चुनावों में हमेशा गहमागहमी रही है.

1987 के बदनाम लोकसभा चुनावों के बाद से ही वहाँ हुर्रियत सहित सभी अलगाववादियों द्वारा लगातार चुनावों के बहिष्कार की अपील की जाती रही है लेकिन इसके बावजूद वहाँ कुछेक मौकों को छोड़कर जनता की भागीदारी अच्छी ख़ासी रही है, 2014 के लोकसभा चुनावों में तो मतदान प्रतिशत पिछले 25 सालों में सबसे अधिक रहा था. राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय राजनीति से परे विधानसभा तथा स्थानीय निकाय के चुनावों में कश्मीरी जनता की भागीदारी अपने क्षेत्र के विकास की प्रक्रिया और वहाँ के प्रशासन में हिस्सेदारी के लिए भी होती है. इसीलिए धमकियों और बहिष्कारों की अपील के बावजूद जब पिछली बार क्रमशः 2005 और 2011 में पंचायत और नगरपालिका चुनाव हुए थे तो जनता ने भारी संख्या में भागीदारी की थी. नब्बे के ख़ूनी दशक के बाद हो रहे 2005 के पंचायत चुनावों में तो घाटी का मतदान प्रतिशत जम्मू और लद्दाख से भी ज़्यादा था. कुछ जगहों पर सौ प्रतिशत लोगों ने वोट दिए तो गान्देरबल, कूपवाड़ा और बारामूला में 85 प्रतिशत से अधिक वोट पड़े थे और स्थानीय चुनाव अब तक कमोबेश स्थानीय मुद्दों तक ही सीमित रहे थे.

लेकिन पिछले चुनावों में मामला अलग था. घाटी में अलगाववादियों के बढ़ते प्रभाव और जनता के बीच भारी असंतोष को देखते हुए दोनों प्रमुख पार्टियों ने इन चुनावों में भाग न लेने का निर्णय लिया था. हालाँकि पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस दोनों ने ही इन चुनावों से अलग रहने के लिए केंद्र सरकार के धारा 35-ए पर रवैये को बहाना बनाया था चुनावों के प्रति जनता की भारी अरुचि की सम्भावना ही थी जिसने कुछ दिनों पहले लोगों से ‘बेहतर भविष्य और विकास’ की अपील कर रहे फ़ारूक़ अब्दुल्ला और अभी हाल में ही सत्ता से बाहर हुईं मेहबूबा मुफ़्ती को सुर बदलने पर मज़बूर किया. फिर भी 35 ए को मुद्दा बनाने के बाद ये चुनाव स्थानीय नहीं रह गए थे. हुर्रियत के दोनों धड़ों और जे के एल ऍफ़ को मिलाकर बनी ज्वाइंट रेसिस्टेंस कमेटी ने इन चुनावों का बहिष्कार करने की अपील की तो आतंकवादी संगठनों ने सीधे सीधे धमकी की भाषा भी अपनाई. इन चुनावों में मुख्य राजनीतिक दलों के बहिष्कार के असर को कम करने के लिए एक समय जम्मू और कश्मीर सरकार ने नगरीय निकाय चुनाव ग़ैर पार्टी आधार पर कराने पर भी विचार किया था लेकिन अंततः चुनाव पार्टी आधार हुए जिनमें भाजपा और कांग्रेस के अलावा केवल सज्जाद गनी लोन की जम्मू और कश्मीर पीपल्स कॉन्फ्रेंस ने भागीदारी की. भाजपा और पीपल्स कॉन्फ्रेंस ने यह चुनाव मिलकर लड़ा तो सबसे बड़ी संख्या निर्दलीय उम्मीदवारों की रही जिनमें नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी से जुड़े लोगों की बड़ी संख्या थी.

चुनावों को सफल बनाने के लिए प्रशासन ने अपनी ओर से सारी कोशिशें कीं. निकायों के आर्थिक अधिकार बढ़ा दिए गए. चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने वाले कर्मचारियों को एक महीने का अतिरिक्त वेतन देने की घोषणा की गई. श्रीनगर तथा अन्य स्थानों पर उम्मीदवारों की सुरक्षा के लिए होटलों में कमरे बुक कराये गए. सुरक्षाबलों की 400 अतिरिक्त कम्पनियाँ नियुक्त की गईं. इन सबसे चुनाव तो लगभग शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हो गए लेकिन दुर्भाग्य से अब्दुल्ला और मुफ़्ती की यह आशंका नगरीय निकाय के चुनावों में तो सही साबित हुई ही, अगले महीने होने वाले पंचायत चुनावों में भी जनता की भागीदारी की फ़िलहाल कोई उम्मीद नज़र नहीं आ रही. अगर आंकड़ों की बात करें तो जहाँ जम्मू और लद्दाख की सभी सीटों पर औसतन 70 फ़ीसद से अधिक मतदान हुआ वहीं घाटी के दस ज़िलों के कुल 624 वार्डों में से 185 वार्डों में एक भी उम्मीदवार नहीं था. बची हुई 439 सीटों में से 231 सीटों पर सिर्फ़ एक उम्मीदवार मैदान में था और 2 सीटों पर एक भी वोट नहीं पड़ा. इस तरह केवल एक तिहाई वार्डों में चुनाव सम्भव हुए. भाजपा के 76 तो कांग्रेस के 78 उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए. अजय पण्डिता उन्हीं में से एक है.

ऐहतियात का आलम यह कि निर्विरोध चुने गए उम्मीदवारों के नाम चुनाव परिणामों के साथ ही घोषित किये गए. इन बची हुई सीटों पर भी वोट देने बहुत कम लोग बाहर निकले. चार चरणों में हुए इन चुनावों के प्रत्येक चरण में क्रमशः 8.3, 3.4, 3.5 और 4.2 प्रतिशत वोट पड़े यानी कुल औसत केवल साढ़े सात फ़ीसद के आसपास रहा ! अब्दुल्ला परिवार का चुनाव क्षेत्र रहा गान्देरबल सबसे अधिक मतदान प्रतिशत वाली इलाक़ों में रहा तो वहाँ भी केवल 11.3 प्रतिशत मतदाता घरों से बाहर निकले. सज्जाद अली लोन के विधानसभा क्षेत्र हंदवारा में केवल 263 वोट पड़े तो श्रीनगर के वार्ड नम्बर 74 में केवल 9 वोट. भाजपा उम्मीदवार बशीर अहमद मीर को इसमें से 8 वोट मिले और उमर अब्दुल्ला ने ट्वीट किया था – ‘अब चुनाव जीतने के लिए परिवार के वोट काफी हैं.’ लेकिन सोचने की बात तो यह है कि दूसरे उम्मीदवार को वोट देने उसके परिवार वाले भी नहीं आए!

हालात ऐसे थे कि पहलगाम में चुनावों के तीसरे चरण के पहले भाजपा के चार उम्मीदवारों के रिश्तेदारों ने आरोप लगाया कि इन्हें बहला फ़ुसला के पर्चे भरवाए गए हैं और जब उन्होंने अपने नाम वापस लेने चाहे तो स्थानीय भाजपा एमएलसी सोफ़ी युसुफ़ ने खानबल के अपने सरकारी आवास में उन्हें बंधक बना लिया. इस विधानसभा के तेरह वार्डों में सिर्फ़ आठ उम्मीदवारों ने चुनाव में हिस्सेदारी की जो सभी भाजपा से थे!  4 अक्टूबर को कुलगाम के दुरू इलाक़े में भाजपा के प्रत्याशी के धान की फ़सल में आग लगा दी गई तो दुरू-वेरिनाग इलाक़े के भाजपा प्रभारी और उम्मीदवार ग़ुलाम हसन बट सहित कई उम्मीदवारों के चुनावों से नाम वापस लेने और पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफ़े के पीछे आतंकवादियों की धमकी की भूमिका ही बताई जा रही है. इन्हीं धमकियों के चलते ही किसी अप्रिय घटना की आशंका को टालने के लिए पहले दौर के चुनाव के दिन बारामूला और बनिहाल के बीच की रेल सेवा स्थगित कर दी गई थी. ज़्यादातर उम्मीदवारों को महीनों होटलों में रखा गया और धमकियों तथा हमलों के बीच उनकी सुरक्षा एक सवाल बनी रही.

अजय पण्डिता ही नहीं, सभी सरपंच अपने लिए सुरक्षा की मांग कर रहे थे. पिछले सितम्बर में गृहमंत्री अमित शाह ने सुरक्षा और दो लाख के कवर का वादा भी किया था. लेकिन सुरक्षा नहीं मिली और नतीज़ा अजय पण्डिता की हत्या.

क्या यह हिन्दू- मुस्लिम मसला है? 

कश्मीर में हर मसले को हिन्दू-मुस्लिम मसला बना दिया जाता है. लोग आसानी से भूल जाते हैं कि 2011-15 के बीच कश्मीर के अलग-अलग इलाक़ों में दस सरपंचों की हत्या हुई थी और बीस सरपंच तथा 128 पंचों ने आतंकवादियों की धमकी के चलते इस्तीफ़ा दे दिया था. ये सभी मुसलमान थे. पिछले साल एक सरपंच के भाई की हत्या के बाद पुलवामा के सभी सिख सरपंचों ने इस्तीफ़े दे दिए थे. इसी भय की वजह  कश्मीर में चुनावों के बाद भी 12,776 पद ख़ाली पड़े हुए हैं. यहाँयह याद दिलाना उचित होगा कि पिछले साल पुलवामा में ही एक सरपंच सैयद रफीक़ अहमद की हत्या के बाद अजय पण्डिता ने अपनी सुरक्षा की मांग की थी लेकिन किसी ने उस पर ध्यान नहीं दिया.

एक अलग सा उदाहरण देता हूँ – इन चुनावों के पहले तक आशा देवी तन्मर्ग के कुंजर वुसन गाँव में मुस्लिम बहुल वार्ड से पंच रहीं. उनसे मैंने मुलाक़ात भी की थी और मेरी किताब में उसका जिक्र भी है. लेकिन इन चुनावों में उन्होंने हिस्सा नहीं लिया. कारण वही डर.

नीचे तस्वीर में आप आशा देवी जी को उनके गाँव की दो अन्य कश्मीरी पण्डित महिलाओं के साथ सबसे दाएँ देखी जा सकती हैं.

ज़ाहिर है कि सरकार बिना किसी डेमोक्रेटिक प्रोसेस के और लोगों का विश्वास जीतने की कोशिश के बिना ऊपर से चुनाव कराके जिस नए ‘ग्रासरूट लीडरशिप’ के उभरने की बात कर रही थी, वह भय के साए में है. अजय पण्डिता की हत्या के बाद सब डरे हैं. द प्रिंट में भाजपा से ब्लॉक डेवेलपमेंट काउंसिल के अध्यक्ष ग़ुलाम मीर कहते हैं कि भारत सरकार ने उन्हें अपने राजनैतिक मक़सद के लिए  स्केपगोट की तरह इस्तेमाल किया.  अजय पण्डिता का पंडित होना एक पक्ष है लेकिन इस हत्या पीछे उनका सरपंच होना महत्त्वपूर्ण पक्ष है. आतंकवादी नहीं चाहते कि कश्मीर में राजनैतिक प्रक्रिया चले. जनता एक तरफ़ नाराज़ है तो दूसरी तरफ़ यह डर भी है. ज़रूरी था कि उसे भरोसे में लिया जाता. ऐसे में वह अपने नेताओं के साथ खड़ी होती. दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ तो ये पंच-सरपंच आगे कुआँ पीछे खाई जैसी स्थिति में फँस गए हैं.

फँसी तो जैसे पूरी कश्मीर घाटी ही है.

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