कश्मीर में जिन्ना और सावरकर

चालीस का दशक कश्मीर में बेहद उथल-पुथल का था. इस दशक में जिन्ना भी वहाँ गए थे और सावरकर भी. जाने को तो नेहरू और गाँधी भी वहाँ गए थे, लेकिन वह क़िस्सा फिर कभी.

कश्मीर में जिन्ना

 गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट के तहत 1937 में  हुए आम चुनावों में  मुस्लिम लीग ने उत्साहवर्धक प्रदर्शन किया था और उसके बाद से मुस्लिम लीग की ताक़त लगातार बढ़ रही थी तथा पकिस्तान की माँग ज़ोर पकड़ने लगी थी । कश्मीर भी उसके प्रभाव से अछूता नहीं रह सकता था । मुस्लिम राष्ट्रवाद का यह उभार कश्मीरी नौजवानों को अपनी तरह से प्रभावित कर रहा था तो नेशनल कॉन्फ्रेंस ने भी मुस्लिम लीग के साथ दुश्मनाना रुख अपनाने की जगह दोस्ताना सम्बन्ध बनाने की कोशिश की ।

जिन्ना को न्यौता

1943 के अक्टूबर महीने में  मुस्लिम लीग के नवाब मम्दौत, मियाँ मुमताज़ दौलताना और राजा गज़नफ़र अली ख़ान कश्मीर घूमने आये तो शेख़ अब्दुल्ला, जी एम सादिक़ और दूसरे नेशनल कॉन्फ्रेंस के कुछ महत्त्वपूर्ण लोगों ने उनसे मुलाक़ात की और जिसमें यह तय किया गया कि कश्मीर में बहुसंख्यक समाज अल्पसंख्यक समाज से ऐसे रिश्ते स्थापित करे कि वे सुरक्षित महसूस करें । नेशनल कॉन्फ्रेंस ने इस प्रस्ताव पर जिन्ना की मुहर लगवाने के लिए जी एम सादिक़ और जी एम बख्शी को लाहौर भेजा । लेकिन सादिक़ को किडनी की कुछ समस्या हो गई और मौलाना मसूदी जिन्ना से मिलने दिल्ली गए और लियाक़त अली ख़ान से उनकी तीन घंटे तक बातचीत हुई ।[i] जिन्ना से सौहार्द्रपूर्ण सम्बन्ध बनाने के लिए शेख़ ने उन्हें कश्मीर आने का न्यौता दिया।

जब जिन्ना कश्मीर आये

मई 1944 में  जिन्ना कश्मीर आये तो उनकी जेब में  दो और न्यौते थे – मुस्लिम कॉन्फ्रेंस और महाराजा हरि सिंह का । नेशनल कॉन्फ्रेंस ने उनके स्वागत में  प्रताप सिंह पार्क में एक सभा रखी, जियालाल किलाम ने स्वागत भाषण पढ़ा[ii] और शेख़ अब्दुल्ला ने उन्हें “भारत के मुसलमानों का प्रिय नेता” कहकर संबोधित किया ।[iii] ज़िन्ना ने अपने भाषण में  नेशनल कॉन्फ्रेंस का शुक्रिया अदा किया और इस बात पर ख़ुशी जताई कि उस सभा में हर समुदाय के लोग उपस्थित थे और कहा कि “मैं आपकी शुभकामनाओं का संदेशा उन दस करोड़ हिन्दुस्तानी मुसलमानों तक ले जाऊँगा जिनका मैं नेता हूँ”, जियालाल किलाम और अन्य ब्राह्मण नेता इस बात से नाराज़ होकर सभा छोड़कर चले गए ।[iv]  इसके तुरंत बाद जिन्ना मुस्लिम कॉन्फ्रेंस की डलगेट पर आयोजित सभा में गए जहाँ उन्होंने कहा-

 

कश्मीर एक मुस्लिम बहुल राज्य है जिसमें  35 लाख मुसलमान रहते हैं जिनका अल्लाह एक है, कलमा एक है और काबा एक है । इसलिए अपनी आज़ादी की लड़ाई लड़ने के लिए उन्हें एक संगठन में शामिल हो जाना चाहिए । दस करोड़ भारतीय मुसलमानों की सहानुभूति आपके साथ है । मैं आपकी सफलता के लिए ख़ुदा से दुआ करूँगा ।[v]

 

मुस्लिम कॉन्फ्रेंस के इस समर्थन के बावज़ूद जिन्ना धर्म और राजनीति के घालमेल के ख़िलाफ़ थे और मीरवायज़ मौलवी युसुफ़ शाह को उन्होंने कहा कि “अगर आप राजनीति से संन्यास ले लें तो हम आपकी वैसी ही इज्ज़त करेंगे जैसी इंग्लैण्ड में  कैंटरबरी के आर्कबिशप की होती है ।” यही नहीं बाद में  किसी से बातचीत करते हुए उन्होंने मीरवायज़ को सड़ा हुआ अंडा भी कहा ।[vi]

शेख़ साहब की धमकी

इस सभा के बाद शेख़ अब्दुल्ला और जिन्ना के बीच सुलह की कोई उम्मीद नहीं बची । शेख़ साहब ने जवाब में कहा – “यहाँ की मुश्किलात हिन्दुओं, मुसलमानों और सिखों को साथ लेकर ही दूर की जा सकती हैं ।” मुस्लिम कॉन्फ्रेंस ने जिन्ना की यात्रा का फ़ायदा उठाकर उसी समय अपना वार्षिक अधिवेशन आयोजित किया और वहाँ बोलते हुए जिन्ना ने नेशनल कॉन्फ्रेंस को “गुंडों का गैंग” कहा तो 20 जून को आयोजित एक सभा में  शेख़ अब्दुल्ला ने कहा- अगर ज़िन्ना हमारे मामलों में टांग अड़ाने की आदत से बाज़ नहीं आयेंगे तो उनके लिए कश्मीर से बाइज्ज़त लौटना मुश्किल हो जाएगा ।[vii]

 

24 जुलाई को जब जिन्ना कश्मीर से लौटे तो न तो वह चौधरी ग़ुलाम अब्बास और शेख़ अब्दुल्ला के बीच कोई समझौता करा पाए थे न ही किसी और तरह की सफलता उनके खाते में थी । मुस्लिम कॉन्फ्रेंस के खुले समर्थन के चलते शेख़ और उनके बीच आगे किसी बातचीत के रास्ते भी बंद हो गए थे । लेकिन इस खुले समर्थन ने कश्मीर में हिन्दू मुसलमान के विभाजन को और गहरा तथा स्थाई तो कर ही दिया जिसके दूरगामी प्रभाव पड़े । शेख़ अब्दुल्ला ने लिखा है – कश्मीर समस्या की जटिलताएँ जिन्ना के अड़ियल रुख की उपज हैं । एक व्यक्ति के रूप में वह बेहद प्रतिभाशाली थे लेकिन इतिहास उनकी राजनीतिक दूरंदेशी के दूसरे पक्ष को दर्ज़ करेगा ।”

 

कश्मीर में सावरकर

जिन्ना की कश्मीर यात्रा के बारे में तो आमतौर से लोग जानते हैं लेकिन यह कम लोग जानते हैं कि उस यात्रा के तुरंत बाद सावरकर कश्मीरी पंडितों से बात करने और उन्हें अपने पक्ष में करने श्रीनगर गए थे। वहाँ वह कश्मीरी पंडितों की “युवक सभा” के मेहमान बन कर गए थे. युवक सभा की मीटिंग मे उन्होंने “हिन्दू राष्ट्र” का पूरा कॉन्सेप्ट समझाया और हिन्दू महासभा से जुड़ने की अपील की।

लेकिन साम्प्रदायिक घृणा से भरी बातें पंडितों को पसंद नहीं आईं. युवक सभा के अध्यक्ष पण्डित शिव नारायण फोतेदार ने उनसे कहा – हमारी परम्परा धार्मिक सहिष्णुता और बंधुत्व की है। आपकी बातें हमारी परंपरा के ख़िलाफ़ हैं और कश्मीर के पण्डित आपकी बातें सुनने को तैयार नहीं हैं। [viii]

इस तरह उस दौर में जिन्ना और सावरकर दोनों कश्मीर से बे आबरू होकर निकले।


पहला हिस्सा कश्मीरनामा और दूसरा कश्मीर और कश्मीरी पंडित से

 

संदर्भ स्रोत

[i]देखें, पेज़ 243, अध्याय 5, डोगरा राज एंड द स्ट्रगल फॉर फ्रीडम इन कश्मीर, मोहम्मद युसुफ गनाई, अप्रकाशित शोध प्रबंध, कश्मीर यूनिवर्सिटी

[ii]देखें, पेज़ 60, फ्लेम्स ऑफ़ चिनार, शेख़ अब्दुल्ला (अनुवाद – खुशवंत सिंह), पेंगुइन- दिल्ली- 1993

[iii]देखें, पेज़ 85, कश्मीर बिहाइंड द वेल, एम जे अकबर, रोली बुक्स, छठा संस्करण- 2011

[iv]देखें, पेज़ 247,  डोगरा राज एंड द स्ट्रगल फॉर फ्रीडम इन कश्मीर, मोहम्मद युसुफ गनाई, अप्रकाशित शोध प्रबंध, कश्मीर यूनिवर्सिटी

[v]देखें, वही, पेज़ 248

[vi]देखें, पेज़ 60, फ्लेम्स ऑफ़ चिनार, शेख़ अब्दुल्ला (अनुवाद – खुशवंत सिंह), पेंगुइन- दिल्ली- 1993

[vii]देखें, पेज़ 85, कश्मीर बिहाइंड द वेल, एम जे अकबर, रोली बुक्स, छठा संस्करण- 2011

[viii] देखें, पेज 71, डायनामिक्स ऑफ पोलिटिकल चेंज इन कश्मीर, डी एन धर, कनिष्क पब्लिशर्स, दिल्ली – 2001

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.