आखिर क्यों चाहिए थी स्वतंत्रता ? – प्रियांक मिश्र

किसी संस्मरण में कहीं पढ़ा था कि उग्र मंडल के पांडेय बेचन शर्मा किसी शाम निराला से भिड़ गए कि आप स्वतंत्रता सेनानियों के लिए गीत क्यों नहीं लिखते, हमेशा बेकारी, गरीबी, जाति संघर्ष पर ही आपकी कलम चलती है। निराला प्रति-उत्तर में बोलते हैं कि ‘आखिर क्यों चाहिए स्वतंत्रता, किसके लिए चाहिए स्वतंत्रता, इन नेताओं के लिए, इनसे तो अंग्रेज ही बेहतर हैं’।

आज़ादी का मतलब

साफ है कि निराला के लिए स्वतंत्रता सच्चे अर्थों में देश के नागरिकों के लिए गरीबी, भुखमरी, वर्ग भेद, भ्रष्टाचार इत्यादि से मुक्ति ही रही होगी और वे उस समय के कुछ नेताओं में जब व्यक्तिगत स्वार्थ और लालच देखते होंगे तो उन्हें खीज आती होगी। मगर आज स्वतंत्रता के 70 वर्षों के बाद भी क्या हम उन सब समस्याओं से उबर पाएं हैं? क्या गरीबी, बेरोजगारी, वर्ग भेद, जातिवाद, क्षेत्रवाद, राजनैतिक एवं प्रशासकीय भ्रष्टाचार से हम आज थोड़े से भी मुक्त हुए हैं और इन सब में सबसे बड़ा प्रश्न है हमारे भीतर की सांप्रदायिकता, क्या हम उससे मुक्त हो सकें हैं? हमारी सरकारें क्या अपने भीतर की एक विशेष किस्म की आक्रामक साम्प्रदायिकता से मुक्त हैं?

क्या लेखक, साहित्यकार, कवि, एक्टिविस्ट, पत्रकार, फिल्मकार ये सब अपने क्षेत्रीय प्रपंचों और मठों के भीतर फैली कुंठाओं से मुक्त हो पाए हैं? क्या उन्होंने उन सब नए आने वालों के लिए रास्ता बनाया है जिनमें प्रतिभा है? क्या ऐसे मंच वर्चस्ववादी सोच से स्वतंत्र हो सके हैं?

वर्ष 2011-12 में सचिवालय की ट्रेनिंग के दौरान प्रोजेक्टर पर एक वीडियो चलता है, जिसमें सांसद मधु लिमये संसद के भीतर बहस के दौरान अपने भाषण में एक जगह कहते हैं कि “माननीय अध्यक्ष जी, कांग्रेस में जो पुराने लोग थे वे काफी त्यागी किस्म के थे, वे देश को अपने घर-परिवार से ऊपर का समझते थे और कार्य करते थे, परन्तु यह परंपरा धीरे-धीरे नष्ट होती चली गई, आज जो लोग कांग्रेस पार्टी में हैं उनके व्यक्तिगत स्वार्थ देश की सेवा से कहीं ऊपर हैं”।

मैं यह सुनने के बाद काफी देर तक सोचता रहा कि मौजूदा सरकार अपनी ही आलोचना अपने ही मंत्रालय के भावी बाबुओं को क्यों सुनवा रही है? शायद उस ट्रेनी अध्यापक की मंशा उस भाषण के माध्यम से यह बताने की रही होगी कि पुराने बाबू भी पुराने कांग्रेसियों की तरह नैतिक और ईमानदार थे और आज के बाबुओं को उनका उसी तरह अनुसरण करना चाहिए जैसे कि नए कांग्रेसियों को पुरनको का, मगर अध्यापक ऐसे मौकों पर अक्सर ही फेल होते रहे हैं और छात्र पास। क्या आज की प्रशासनिक व्यवस्था गुलामी के उस दौर से से मुक्त हो पाई है? क्या आज पंक्ति में खड़े सबसे आखिरी व्यक्ति की पहुँच प्रशासन तक हो पाई है?

जो जिसके लिए प्रतिबद्ध है, वही उसे नष्ट कर रहा

परसाई लिखते हैं कि ‘इस देश में जो जिसके लिए प्रतिबद्ध है, वही उसे नष्ट कर रहा है। लेखकीय स्वतंत्रता के लिए प्रतिबद्ध लोग ही लेखक की स्वतंत्रता छीन रहे हैं’। मुझे भी ऐसा ही लगता है। देश, प्रत्येक वर्ष जब स्वतंत्रता दिवस मनाता है तो वह एक किस्म की गुलामी की ओर उन्मुख होता जाता है, वह गुलामी हर वर्ष नए किस्म की होती है।न नामचीन संस्थाएं तक इस चादर को ओढ़ती चलती हैं। राष्ट्रध्वज फहराने वाले भद्र लोग दूर से इस फैलती हुई चादर को देखकर मुस्कुराते हैं और सड़क किनारे की बड़ी-बड़ी होर्डिंग्स पर मुस्कुराहट के साथ स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं देते जाते हैं। मुझे ऐसी शुभकामनाएं अक्सर उदास करती हैं।

वैसे भी इन बधाइयों/नारों के शोर में जाति-बिरादरी और उसके अंतर को आज भी उसी तरह बढ़ाया जा रहा है जैसे आजादी से पहले अंग्रेज बढ़ाते थे। आचार्य रामविलास जी एक साक्षात्कार में कहते हैं कि “कोई नारा अपने आप में अच्छा या बुरा नहीं होता, देखना यह चाहिए कि नारा कौन दे रहा है और किस उद्देश्य से दे रहा है”। गांधी भी हरिजनों की सामाजिक मुक्ति की बात करते रहे हैं और आज के नेता भी। मगर क्या उद्देश्य एक दिखता है, क्या मुक्ति हो सकी है?

अभी भी बने हुए हैं भेद

सामाजिक न्याय के परिदृश्य में क्या आज इतने वर्ष बाद भी स्त्रियों के बीच का वर्ग भेद मिट सका है, क्या अल्पसंख्यक और आदिवासियों के हितों की रक्षा आज हो पाई है? साम्प्रदायिकता की जिस आंधी से लड़कर यह देश स्वतंत्रत हुआ था वह आज भी बदस्तूर चली जा रही है। मैंने किसी बहस में कभी कहा था कि आज की साम्प्रदायिकता से कहीं भयानक साम्प्रदायिकता का सामना इस मुल्क के पहली बेंच के लीडरान ने किया है, तब जबकि हुकूमत भी विदेशी थी और उनकी चाहत भी फूट डालकर राज करने की थी। वे तब मुखर होकर उस समय की साम्प्रदायिकता से लड़े मगर उनके तरीके दूसरे थे।

आज जो साम्प्रदायिकता से लड़ने की बात कहते हैं क्या वे उन्हीं तरीकों को अपनाते हैं। यहां मिलाने से ज्यादा अलग करने पर जोर अधिक है। कभी किसी संघ के प्रवक्ता को बोलते हुए कहीं सुना था कि वे भी साम्प्रदायिकता से लड़ रहे हैं, मुझे लगा लड़ ही रहे होंगे ठीक वैसे ही जैसे चीन कोरोना से, अमरीका ड्रग्स व्यापार से, पाकिस्तान आतंकवाद से, रशिया सोशलिज्म से और आप साम्प्रदायिकता से। लड़कर आप लोग इस देश को साम्प्रदायिकता से मुक्ति दिला ही देंगे।

अरुंधति ने अभी हाल ही में एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने लिखा है कि ‘उन्हें आश्चर्य है कि इस मुल्क के लोगों में कितनी अधिक सहन शक्ति है’। मुझे भी यकीन है कि यह मुल्क सहने का आदी है, लोग सहन करने के साथ-साथ मुस्कुराते जाते हैं, इन तमाम तरीकों में अपने तरीके की स्वतंत्रता की आस में स्वतंत्रता दिवस से लेकर गणतंत्र दिवस तक। शायद वह मनपसंद स्वतंत्रता उन्हें कभी मिल भी जाये मगर बिना संघर्ष क्या ये सम्भव है और संघर्ष भी किससे, स्वयं से ही अधिक। ठीक यही शंका और आश्चर्य अरुंधति को भी है।

 

कामायनी में प्रसाद जी एक जगह लिखते हैं

कर्म-यज्ञ से जीवन के सपनों का स्वर्ग मिलेगा,

इसी विपिन में मानस की आशा का कुसुम खिलेगा,

किंतु बनेगा कौन पुरोहित, अब यह प्रश्न नया है….?”

 

 

स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाओं के साथ

जय हिंद-लाल सलाम-वंदेमातरम

प्रियांक मिश्र

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