दादू मियाँ : ग़रीबों का मसीहा

हिन्दुस्तान की आज़ादी की लड़ाई एक दिन की नहीं है. 1857 के पहले भी अनेक विद्रोह हुए हैं. अयोध्या सिंह की किताब – भारत का मुक्ति संग्राम- ऐसी लड़ाइयों का ज़िन्दा दस्तावेज़ है.

आज जिस क़दर हिन्दू-मुसलमान बना दिया गया है चीज़ों को उसमें एक आख्यान ऐसा बनाया गया है कि मानो सिर्फ़ हिन्दू देशभक्त हैं और बाक़ी बाहरी. यह देश को तोड़ने वाला आख्यान है. इस लम्बी जंग में हिन्दू-मुसलमान-सिख-आदिवासी-मर्द-औरत-शहर-गाँव-उत्तर-दक्षिण सबने अपना लहू दिया है. शंतिमोय रे की किताब – Freedom Movement and Indian Muslims – आज़ादी की लड़ाई में मुसलमानों के योगदान को रेखांकित करने वाली बेहद ज़रूरी किताब है. कुछ बरस पहले इसका हिन्दी अनुवाद मैंने नेशनल बुक ट्रस्ट के लिए किया था, किताब हिन्दी और अंग्रेज़ी, दोनों भाषाओँ में अमेजन पर उपलब्ध है.

आज दादू मियाँ (कुछ जगहों पर दुदू मियाँ भी नाम आया है) का क़िस्सा उसी किताब से –

दादू मियाँ : क़ाबिल पिता के क़ाबिल औलाद

पंजाब (अब पाकिस्तान) के फ़रीदपुर ज़िले के हाजी शरीयतुल्लाह ने फराज़िया आन्दोलन शुरू किया था 1820 में पूर्वी बंगाल के गाँवों से. 1819 में जन्मे मुहम्मद महासिन दादू मियाँ उन्हीं की औलाद थे. बाप की मृत्यु के बाद दादू मियाँ ने अंग्रेज़ों को भगाने का उनका सपना अपनी आँखों में ले लिया और उस इलाक़े के ग़रीब मज़दूरों और किसानों के साथ अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ जंग छेड़ दी.

उन्होंने राजनैतिक मुक्ति के सवाल में आर्थिक सवालों को जोड़ा और एक सेना खड़ी की जिसके पास देशी हथियार थे. इसके अलावा धार्मिक और राजनैतिक पंचायतें बनाई जो सेल्फ गवर्नेंस का उनका मॉडल थीं.

उस दौर में ढाका के कमिश्नर आई दन्बार ने लिखा – हर उस जगह जहाँ फराज़ीन थे, दादू मियाँ का एक एजेंट था जिसे ख़लीफ़ा, मुंशी या सरदार के नाम से जाना जाता था, यह संगठन को बढ़ाने के लिए लगान लेता था जो काफी हद तक आयरलैंड की उस प्रणाली से मिलता था जिसे ओ’कॉनेल का लगान कहते हैं.

संघर्ष और मृत्यु  

पुलिस स्रोतों के अनुसार दादू मियाँ ने अस्सी हज़ार लोगों की सेना खड़ी की थी. नीलहे किसान, रईस मुस्लिम और हिन्दू ज़मींदार उनके ख़िलाफ़ अंग्रेज़ों के साथ थे तो ग़रीब कारीगर और मज़दूर उनके साथ. 1847 में दोनों के बीच बड़ी लड़ाई हुई. उन्हें गिरफ़्तार कर मुक़दमा भी चला लेकिन सबूत नहीं मिले तो रिहा कर दिया गया.

लेकिन 1857  महान विद्रोह के दौरान उन्हें र गिरफ़्तार कर भारी यातना दी गई. विद्रोह के बाद वह रिहा होकर अभी अपने गाँव पहुँचे ही थे कि फिर गिरफ़्तार करके जेल में डाल दिया गया. जेल के उत्पीडन ने उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर डाला और 1860 में रिहा होने के थोड़े ही दिन बाद केवल 41 साल की उम्र में ढाका में उनकी मृत्यु हो गई.

पूर्वी बंगाल के गाँवों में ग़रीबों के इस मसीहा के गीत उनकी मौत के बहुत बाद तक गाये जाते रहे.

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