हाशिये से बाहर : 48,000 झुग्गी मामला: सबसे खतरनाक होता है सिर से छत का छिन जाना – मीना कोटवाल

झुग्गियों की संख्या- 48000

रहने वालों की संख्या- लाखों में

सुप्रीम कोर्ट का फरमान आता है कि दिल्ली- एनसीआर में 140 किलोमीटर लम्बी रेल पटरियों के आसपास की लगभग 48000 झुग्गियों को तोड़ा जाएगा. ये आंकड़ा शायद सुप्रीम कोर्ट के लिए ज्यादा बड़ा ना रहा हो, जिसके लिए फैसला सुनाने में उन्हें देर नहीं लगी. लेकिन इन झुग्गियों में बसने वाले लोगों का आंकड़ा लाखों में हैं. अगर एक परिवार में औसतन चार से पाँच सदस्य भी रहते हैं तो 48000 झुग्गियों में 192,000-240,000 लोग रहते हैं. इन झुग्गियों के साथ इन लाखों लोगों के सपने भी टूटने जा रहे हैं. इन झुग्गियों में इन्होंने देखे होंगे कई सपने, किसी ने शिक्षा पा कर यहाँ कुछ कर दिखाने का, किसी ने अपनी शादी का तो किसी ने देखा होगा इन झुग्गी वालों के लिए कुछ कर दिखाने का ताकि जो उन्होंने झेला वो कोई और झेल सके. इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने केवल इन झुग्गियों को तोड़ने का ही आदेश नहीं दिया है बल्कि इन झुग्गियों के साथ ये सपने भी चकनाचूर होने जा रहे हैं.

आश्वासन

हालांकि सरकार की तरफ से अब कई आश्वासन दिए जा रहे हैं. कोई कह रहा है कि जब तक हम ज़िंदा है तब तक किसी को भी झुग्गी खाली करने की जरूरत नहीं, तो कोई कह रहा है कि हम 48000 परिवार के रहने का इंतजाम करेंगे. लेकिन ये आश्वासन कब तक! क्योंकि उन झुग्गियों में कौन से परिवार रहे हैं ये हम सब जानते हैं. ये झुग्गी उन लोगों के लिए किसी महल से कम नहीं क्योंकि उस जगह वे अपनी रात गुज़ारते हैं, ये जगह हर मौसम में उन्हें बचाती है. दिल्ली जैसे भीड़-भाड़ वाले शहर में रहने और चैन से साँस लेने की जगह देती है इनकी ये मामूली सी कहलाने वाली झुग्गी.

इसमें कोई शक नहीं है कि इनमें अधिकतर परिवार बहुजन समाज के हैं. इन परिवार में रहने वाले अधिकतर लोग मजदूरी करते होंगे, कोई सड़को पर कूड़ा-करकट साफ करता होगा, कोई सीवर साफ करता होगा, तो अधिकतर महिलाएँ दूसरों के घरों में साफ़-सफाई का काम करती होंगी. यानी कुल मिलाकर इनमें रहने वाले वे मेहनतकश लोग हैं जिन्हें उस समय पर मुद्दा बनाया जाता है जब माहौल चुनावी हो, इनकी फ़िक्र तब और अधिक बढ़ भी जाती है, इनकी झुग्गियों की हालत को सुधारने और उन तक जाने वाले रास्तों को काँटों की जगह फूल बिछाने के वादे भी किए जाते हैं लेकिन तब, जब माहौल चुनावी हो.

हेडलाइंस से दूर

अगर माहौल चुनावी नहीं है तो न इनके मुद्दे मीडिया में होते हैं, न नेताओं के किसी के काम के. इसलिए जब सुप्रीम कोर्ट से इन झुग्गियों को हटाने का आदेश आता है तो मेनस्ट्रीम मीडिया में कोई खास मुद्दा नहीं होता, कोई प्राइम टाइम बहस नहीं होती… हाँ, दूसरी तरफ जब फिल्म अभिनेत्री कंगना रनौत के ऑफिस के सामने का हिस्सा टूटता है तो वही मीडिया इसका लाइव टेलीकास्ट दिखाती है, हर छोटी से छोटी बात जनता तक पहुँचाती है, उसे प्राइम टाइम भी बनाया जाता है. कंगना के लिए इंसाफ़ की गुहार लगाई जाती है लेकिन अफ़सोस… मीडिया में लाखों लोगों का दुख-दर्द भी कंगना की जगह ना ले पाया.

इस आदेश के बाद मैंने फेसबुक पर एक लड़की की कहानी का कुछ हिस्सा उसकी फेसबुक पोस्ट के जरिए जाना कि कैसे उसने उस माहौल में पढ़ाई की जहाँ पूरा दिन शोर-शराबा रहता था. सबके बीच रहकर उसी कमरे में पढ़ाई करना किसी चैलेंज से कम नहीं होता, ये मैं भी बखूबी समझती हूँ. आज विजेता राजभर पीएच.डी की तैयारी कर रही हैं. लेकिन जब से उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बारे में जाना, उनका मन पढ़ाई में ना लग कर इस चिंता में डूब गया है कि आगे क्या होगा, आगे रहने की व्यवस्था कैसे होगी, वे और उनका परिवार कहाँ जाएँगे…आदि. इन लाइनों का दर्द और सिर पर छत ना रहने का दर्द और डर वही जान सकता है जो ऐसे माहौल में या तो रहा हो या उसने इन लोगों का दर्द अपने दर्द की तरह महसूस किया हो.

खैर, ये सिर्फ इन्हीं झुग्गी वालों का दर्द नहीं. लॉकडाउन के बाद हमारे देश की अर्थव्यवस्था की हालत किसी से छिपी नहीं है. देश के गरीबों और किसानों की हालत तो बुरी थी ही देश के युवाओं की हालत भी बुरी से बदत्तर हो गई है. देश की ग़रीबी बढ़ती जा रही है. सरकार इनका समाधान ढूंढ़ने और गरीबी दूर करने के बजाय गरीबों को हटा रही है. यह पूरा सिस्टम जैसे ग़रीब-मज़दूरों के खिलाफ काम कर रहा है.

कोरोना और लॉकडाउन के शुरूआती दिनों को याद कीजिए, महिलाएं-बच्चे जब हज़ारों किलोमीटर का सफर पैदल तय कर रहे थे. कितने ही मज़दूर सड़क पर चलते-चलते मर गए, गर्भवती महिलाओं ने रोड पर बच्चों को जन्म दिया, लोग भूख से मर गए लेकिन क्या किसी सरकार ने उनकी ओर ध्यान दिया? क्या यह मुद्दा बना सत्ता में बैठे लोगों के लिए? ज्यादातर लोगों का जवाब होगा, नहीं. हम सब जानते हैं कि देश में वंचितों/शोषितों पर रोजाना जुल्म हो रहे हैं लेकिन यह व्यवस्था कुछ नहीं कर रही है. यहां हर शख्स की गिनती बस वोट के तौर पर रह गई है. यही कारण है कि लाखों लोगों को झुग्गियों से बेदखल करने का फरमान आ चुका है लेकिन कोई भी दल अभी तक इसका हल नहीं निकाल पाया है. जब बात इस लॉकडाउन के कारण मारे गए मजदूरों के आंकड़ों की आती है तो केंद्र सरकार के पास इसका कोई आंकड़ा नहीं मिलता. यानी गरीब की मौत से सत्ता में बैठे लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता, अगर वही मजदूर वोट के लिए बुलाए जाएं तो तुरंत उनका डाटा भी निकल जाएगा और उनको वोटिंग बूथ तक लाने की पूरी व्यवस्था भी कर दी जाएगी.

क्या करें, कहाँ जाएँ

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के मुताबिक साल 2019 में रोजाना 117 किसानों और दिहाड़ी मजदूरों ने आत्महत्या की. कुल 42,480 किसानों और दिहाड़ी मजदूरों ने आत्महत्या की. राष्ट्रीय शर्म की ये खबरें अख़बार के किसी कोने में छाप दी जाती हैं और इस तरह से सबकी जिम्मेवारी पूरी हो जाती है. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में तो इन ख़बरों को दिखाया तक नहीं जा रहा है. विपक्ष सरकार को इतने बड़े मुद्दे पर घेर तक नहीं पा रही है. आजादी के 7 दशक बाद भी किसानों-मज़दूरों का मरना आम बात बना दी गई है. सत्ता में कोई भी पार्टी रही हो लेकिन मेहनतकश लोगों का कष्ट कम नहीं हो पाया. जानते हैं ऐसा क्यों हो रहा है क्योंकि चुनाव कभी इन मुद्दों पर पार्टियाँ लड़ती ही नहीं हैं. अगर लड़ती भी है तो सिर्फ नारों और भाषणों तक ही ये मुद्दे सीमित रह जाते हैं. हर व्यक्ति को वोट में तब्दील कर दिया गया है और लोकतंत्र खोखला होता जा रहा है. जिस तरह से दिन-प्रतिदिन हाशिये पर खड़े लोगों को दरकिनार किया जा रहा है वो दिन भी दूर नहीं है, जब हर तरह के आंकड़े और आवाजों पर रोक लगा दी जाएगी.

ऑक्सफेम की हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनिया भर में असामनता तेज़ी से बढ़ रही है. रिपोर्ट के मुताबिक भारत में एक प्रतिशत आबादी के पास 70 प्रतिशत भारतीयों से चार गुना ज्यादा संपत्ति है. सिस्टम ऐसा बना दिया गया है कि अमीर और ज्यादा अमीर होता जा रहा है और ग़रीब लगातार ज़रूरी चीजों के अभाव में मर रहा है. व्यवस्था की यह चोट दलित, आदिवासी, महिला पर ज्यादा पड़ रही है. ये 48 हजार झुग्गियाँ भी इसका एक उदाहरण हैं.

कितनी ही विजेता राजभर जैसी जुझारू महिलाएँ व्यवस्था के सामने दम तोड़ देती हैं. वे जीने के लिए लड़ें या फिर सपनों को पूरा करने के लिए. सपनों को पूरा न करके जीना मौत के समान है. क्रांतिकारी कवि अवतार सिंह पाश ने लिखा था-

 

‘सबसे खतरनाक होता है

मुर्दा शांति से भर जाना

तड़प का न होना सब सहन कर जाना

घर से निकलना काम पर

और काम से लौटकर घर जाना

सबसे खतरनाक होता है

हमारे सपनों का मर जाना’

 

माफ करना विजेता मैं तुम्हारे लिए ये शब्द ही लिख पा रही हूँ. काश तुम्हारे सपनों को मैं पंख लगा पाती, काश तुम्हारी झुग्गियों को ही बचा पाती, काश मैं इंसानियत को बचा पाती, मैं ये सब समझ पा रहीहूँ क्योंकि मेरी भी परवरिश कुछ इसी तरह के माहौल में हुई है.

युवा पत्रकार मीना कोटवाल का पाक्षिक कॉलम ‘हाशिये से बाहर’ अब आप इस ब्लॉग पर नियमित पढ़ सकेंगे.

Freelance Journalist

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