अगस्त क्रान्ति : गाँधी और सावरकर

दूसरा विश्वयुद्ध और गाँधी

दूसरा विश्वयुद्ध जब शुरू हुआ तो गाँधी शुरूआत में इस मुश्किल वक़्त में असहयोग के पक्ष में नहीं थे[1] लेकिन जिस तरह से यह युद्ध भारत पर थोपा गया था गाँधी ने उसका तीख़ा विरोध किया और उन्होंने यह स्पष्ट स्टैंड लिया कि अंग्रेज़ भारत छोड़कर चले जाएँ

5 फरवरी 1940 वायसराय से मुलाक़ात के बाद उन्होंने कहा – मैं किसी शांतिपूर्ण और सम्मानजनक समझौते की कोई उम्मीद नहीं देखता।

उसी साल मार्च के महीने में हुई रामगढ़ कांग्रेस में घोषणा की गई –कांग्रेसी या कांग्रेस के असर में आने वाला कोई व्यक्ति इस युद्ध के लिए सेना में भर्ती या आर्थिक सहयोग नहीं करेगा।

 

 

व्यक्तिगत सत्याग्रह

गाँधी ने व्यक्तिगत सत्याग्रह की शुरुआत की तो सबसे पहले विनोबा भावे युद्धविरोधी भाषणों के आरोप में गिरफ़्तार हुए फिर जवाहरलाल को गिरफ्तार कर चार साल की सश्रम कारावास की सज़ा दी गई। बाद में पटेल और मौलाना आज़ाद को भी गिरफ़्तार कर लिया गया। [2]

मार्च 1942 में सर स्टेनफोर्ड क्रिप्स के डोमिनियन स्टेटस के प्रस्ताव को ठुकराने के बाद उन्होंने मांग कीमेरा दृढ़ विश्वास है कि अब ब्रिटिश एक क्रमबद्ध तरीक़े से भारत को छोड़कर चले जाएँ।

इलाहाबाद में कांग्रेस की कार्यकारिणी की बैठक में उन्होंने मीराबेन के हाथों ‘भारत छोड़ो’ का प्रस्ताव भिजवाया।

विकल्प के सवाल पर 24 मई 1942 को हरिजन में उन्होंने लिखा – अंग्रेज़ भारत को भगवान के भरोसे छोड़ दें और अगर वह बहुत अधिक लग रहा है तो अराजकता पर छोड़ दें।[3] बम्बई में कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में उन्होंने ‘करो या मरो’ का मन्त्र दिया। 8 अगस्त की रात को ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ की शुरुआत हुई। ब्रिटिश सरकार ने इसे अपने शासन से विद्रोह माना और उसी रात गाँधी सहित कांग्रेस के सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ़्तार कर लिया गया। दो दिन बाद कांग्रेस कमिटी को ग़ैरक़ानूनी घोषित कर दिया गया।[4]

पहले विश्वयुद्ध में अंग्रेज़ों की सहायता को तत्पर गाँधी और दूसरे युद्ध में उन्हें देश छोड़कर चले जाने को कह रहे गाँधी में यह बड़ा बदलाव था। यह बदलाव भारत के भीतर जनता की पीड़ा और शासन के दमन के उन प्रत्यक्ष अनुभवों से आया था जिनके बाद वह अंग्रेज़ी शासन को ‘शैतानी’ कह रहे थे। जो गाँधी बीसवीं सदी के पहले दशक में अंग्रेज़ों की लोकतांत्रिक दृष्टि के क़ायल थे वही चंपारण से जालियांवाला बाग़ जैसी सैकड़ों घटनाओं को देखते मुतमईन हो चुके थे कि अंग्रेज़ी शासन अपने व्यवहारिक रूप में भारतीय जनता के लिए दमनकारी है।

सावरकर ने अंग्रेज़ों का साथ दिया

लेकिन दूसरी तरफ़ सावरकर का स्टैंड नहीं बदला। वह पहले विश्वयुद्ध के दौरान अपनी रिहाई की प्रार्थना करते हुए 1914 में लिख रहे थे –

जबसे योरप में यह युद्ध शुरू हुआ है जिसने दुनिया को हिलाकर रख दिया है किसी और चीज़ ने हर सच्चे हिन्दुस्तानी देशभक्त के हृदय में उम्मीद और उत्साह का रोमांच पैदा किया है जितना इस तथ्य ने कि भारत के युवाओं को ब्रिटिश साम्राज्य और भारत की रक्षा में हथियार उठाने की अनुमति दी गई है…मैंने अत्यंत कृतज्ञतापूर्वक स्वयं को इस युद्ध में भारत सरकार जिस भी रूप में उचित समझे एक स्वयंसेवक के रूप में प्रस्तुत करता हूँ।[5]

इस पूरे ख़त को पढ़ते हुए एकतरफ आश्चर्य होता है कि गिरफ़्तारी के पहले अंग्रेज़ों की इतनी तीख़ी मुखालिफ़त करने वाले सावरकर किस तरह ख़ुद को अंग्रेज़ी साम्राज्य का देशभक्त नागरिक ही नहीं बताते बल्कि उनके पक्ष से लड़ने की भी बात करते हैं।

क्या सावरकर सभी क़ैदियों की रिहाई की बात कर रहे थे?

(मूल पत्र के लिए शोधार्थी एम एस सैफुल्लाह का यह ट्वीट थ्रेड देख सकते हैं. साथ ही इसका मिलान आप विक्रम संपत की किताब के परिशिष्ट में दिए पत्र से भी कर सकते हैं.)

 

इसी ख़त के आधार पर दावा किया जाता है कि सावरकर केवल अपने नहीं बल्कि सभी राजनैतिक क़ैदियों की रिहाई की अपील कर रहे थे। यहाँ दो तथ्य समझ लेने से इस दावे की असलियत समझ आ जाती है।

पहला इसके पहले 1911 और 1913 में लिखे माफ़ीनामों और रिहाई की अपीलों में केवल अपनी रिहाई और सुविधाओं की बात है। दूसरा इस ख़त में जो बाक़ी क़ैदियों की रिहाई की बात है उस मांग के पीछे कारण बताया गया है कि अगर ब्रिटिश हुकूमत उन्हें रिहा कर देगी तो न केवल वे उसके लिए कृतज्ञ होंगे बल्कि उनका उपयोग युद्ध के लिए ब्रिटिश सेना में किया जा सकेगा! ज़ाहिर है यह रिहाई की माँग चाटुकारिता के उस लहज़े में है जहाँ यह कहने की कोशिश की गई है कि मैं अकेला गिरफ़्तारी के बाद अंग्रेज़ी हुकूमत की दासता स्वीकार करने वाला नहीं बल्कि मैंने अपने जैसे और भी कई लोगों को तैयार किया है जो रिहा होकर आपका काम करेंगे। साथ ही एक कुशल लेखक ने भाषा की बाजीगरी से अपनी निष्ठा के साथ ब्रिटिश सरकार के लिए अपने समर्पण को दिखाने की चालाक कोशिश करते हुए कहा है कि अगर मेरी रिहाई ही इनकी रिहाई में समस्या बन रही है तो कम से कम इन्हें रिहा कर दिया जाए ताकि ये ब्रिटिश हुकूमत की सेवा कर सकें। बहुत स्पष्ट है कि सावरकर उन देशभक्तों की रिहाई की मांग नहीं कर रहे जिन्होंने जेल की मुसीबतों से टूट जाना स्वीकार किया लेकिन अंग्रेज़ी हुकूमत की दासता नहीं।

दूसरे विश्वयुद्ध के समय सावरकर

अक्सर कहा जाता है कि उन्होंने रिहाई के लिए माफ़ीनामे इसलिए लिखे कि बाहर आकर देश की आज़ादी की लड़ाई लड़ सकें। लेकिन जेल से आज़ाद होने के बाद भी उनके रुख में कोई बदलाव नहीं दिखाई देता। अपने माफ़ीनामे में उन्होंने सदा अंग्रेज़ों के आज्ञाकारी सेवक रहने का जो वादा किया था, उसे वह ईमानदारी से निभाते दीखते हैं। उन्होंने आह्वान किया – इसलिए हिन्दू आगे आयें और थल सेना ,नभ सेना ,जल सेना ,तोपखाने तथा अन्य युद्ध -कला से जुड़े कारखानों में हजारों की तादाद में भर्ती हों।[6] ब्रिटिश सैन्य बल में भर्ती होने की इच्छा रखने वाले हिन्दुओं की सहायता हेतु सावरकर के नेतृत्व में हिन्दू महासभा ने देश के विभिन्न क्षेत्रों में उच्च स्तरीय ‘युद्ध-परिषदों ‘ का गठन किया।इसके अतिरिक्त वायसराय ने सावरकर की पसंद के व्यक्तियों को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद्’ में स्थान दिया जिसके लिए सावरकर ने वायसराय तथा ब्रिटिश सेना के कमांडर-इन-चीफ को इस टेलीग्राम के जरिये कृतज्ञता ज्ञापित किया – ‘योर एक्सीलेंसी की सुरक्षा समिति के कार्मिकों सम्बन्धी घोषणा का स्वागत है। इसमें हिन्दू महासभा के सर्वश्री कलिकार तथा जमनादास मेहता की नियुक्ति पर महासभा विशेष प्रसन्नता व्यक्त करती है.’

तत्कालीन वायसराय ने लिखा है –

सावरकर ने कहा कि यह स्थिति ऐसी है कि महामहिम की सरकार को अब हिन्दुओं की तरफ़ मुड़ना चाहिए और उनके सहयोग से काम करना चाहिए…हमारे हित सामान हैं…ज़रूरी चीज़ है कि हिन्दुत्व और ग्रेट ब्रिटेन अब मित्र बनें और पुरानी दुश्मनी की अब कोई आवश्यकता नहीं है। उन्होंने यहाँ तक कहा कि हिन्दू महासभा युद्ध के बाद डोमिनियन स्टेट्स को स्वीकार करने के लिए स्पष्ट वचन देने को तैयार है।[7]

विपदा में अवसर 

वह इस विपदा में अपने लिए अवसर देख रहे थे। कांग्रेस के सभी बड़े नेता या तो जेल में थे या फिर भूमिगत। इस समय अंग्रेज़ों का सहयोग कर बदले में मिले डोमिनियन स्टेट्स में उन्हें अपने लिए संभावना दिख रही थी। जिस तरह जिन्ना ख़ुद को मुसलमानों का नेता बताकर अंग्रेज़ों से किये सहयोग के बदले पाकिस्तान की उम्मीद कर रहे थे उसी तरह सावरकर ख़ुद को हिन्दुओं का इकलौता प्रतिनिधि क़रार कर अपने लिए शासन की उम्मीद कर रहे थे।

हालाँकि इस दौर तक हुए चुनावों में कांग्रेस ने दोनों के दावों को ध्वस्त किया था। सावरकर की हिन्दू महासभा के साथ हिन्दुओं का एक बहुत छोटा सा हिस्सा भर था।

लीग के साथ हिन्दू महासभा

सामान लक्ष्यों के कारण सावरकर और जिन्ना इस समय हाथ मिलाने से नहीं चूके। जब भारत छोड़ो आन्दोलन के चलते देश भर में कांग्रेस की सरकारें बर्ख़ास्त कर दी गईं तो अवसरवाद का चरम प्रदर्शन करते हुए मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा ने सिंध और बंगाल में मिलकर सरकारें बनाई। यहाँ यह याद दिलाना समीचीन होगा कि सिंध में तत्कालीन मुख्यमंत्री अल्ला बख्श को भारत की आज़ादी की मांग के समर्थन में खान बहादुर और अन्य उपाधियाँ लौटा देने के ‘अपराध’ में ब्रिटिश सरकार ने बर्खास्त कर मुस्लिम लीग को आमंत्रित किया था[8] और ख़ुद को राष्ट्रवादी कहने वाली हिन्दू महासभा ने ऐसी सरकार को समर्थन ही नहीं दिया बल्कि ख़ुलेआम पाकिस्तान का प्रस्ताव  पेश किये जाने पर भी समर्थन जारी रखा। 1942 में कानपुर में संपन्न 24वे सत्र को संबोधित करते हुए निम्नलिखित शब्दों में जायज़ ठहराया था –

महासभा भलीभाँति अवगत है कि व्यावहारिक राजनीति में हमें आगे बढ़ने हेतु किंचित समझौते भी करने होंगे। उदाहरण के तौर पर सिंध  में आमंत्रण मिलने पर महासभा ने मुस्लिम लीग के साथ मिलकर  गठबंधन सरकार चलाई। बंगाल का मामला सर्व-विदित है ।वही दुष्ट लीगी जो कांग्रेस के दब्बूपने भरे आचरण के बावजूद शांत नहीं हो सके ,ज्यों ही हिन्दू महासभा के संपर्क में आये, पर्याप्त समझौतावादी तथा सामाजिक रूप से मिलनसार आचरण पर उतर आये और श्री फज़ल उल हक़ के मुख्यमंत्रित्व तथा हमारे श्रद्धेय नेता श्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में दोनों समुदायों के भले के लिए गठबंधन सरकार एक साल से अधिक समय तक चली।[9]

 

श्यामाप्रसाद मुखर्जी का उत्साह उस दौरान सावरकर की अध्यक्षता वाली हिन्दू महासभा की नीयत को साफ़ करता है जब उन्होंने लीग के साथ संयुक्त सरकार का में वित्तमंत्री रहते हुए ब्रिटिश सरकार का समर्थन करते हुए भारत छोड़ो आन्दोलन को कुचलने की योजना का पत्र अंग्रेज़ी हुक्मरान सर जॉन हर्बर्ट को लिखा था। इसमें वह लिखते हैं-

 

युद्ध के दौरान, सरकार को कांग्रेस द्वारा समर्थित क्रांतिकारी आन्दोलन को बंगाल में फैलने से रोकना चाहिए। सवाल यह है कि इस आन्दोलन का बंगाल में दमन कैसे किया जाए। मैं एक सुझाव दे रहा हूँ जिससे कांग्रेस के नेतृत्व वाला आन्दोलन विफल हो जायेगा।[10]

 

स्पष्ट है कि सावरकर और उनके समर्थक अंग्रेज़ों का विरोध करने की जगह उस दौर में अंग्रेज़ों की मुखालिफ़त करने वाले ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ के दमन में अंग्रेज़ों का सहयोग कर रहे थे। प्रथम विश्वयुद्ध के समय जो सावरकर जेल से मुक्ति के लिए अंग्रेज़ी सेना में भर्ती होने के प्रस्ताव दे रहे थे वह सावरकर दूसरे विश्वयुद्ध में युद्ध के बाद मिलने वाले डोमिनियन स्टेट्स के शासन में हिस्सा पाने के लिए अंग्रेज़ों का सहयोग कर रहे थे। 1857 के जिस विद्रोह को भारत के हिन्दू-मुसलमानों का एक साझा स्वाधीनता संग्राम बताया था युवा सावरकर ने वह जानता था कि इसके ठीक बाद बम्बई के तत्कालीन गवर्नर लार्ड एल्फिन्स्टाईन ने 14 मई 1859 को एक बैठक में नोट किया था – ‘बांटो और राज करो’ (Divide et Impeta) एक पुरानी रोमन कहावत है,यह अब हमारी नीति होनी चाहिए,[11] लेकिन वृद्ध सावरकर ने ख़ुशी-ख़ुशी इस नीति का हिस्सा बनना स्वीकार कर लिया। यह एक स्वार्थ से दूसरे स्वार्थ तक की सिद्धान्तहीन यात्रा थी।

लेकिन सफलता नहीं मिली 

लेकिन इस बार उन्हें सफलता नहीं मिली। सभी बड़े नेताओं के जेल में रहने के बावजूद जिस तरह का देशव्यापी संघर्ष उठ खड़ा हुआ उसने बताया कि जनता गाँधी के साथ खड़ी है। द्वितीय विश्वयुद्ध की जीत ब्रिटेन को बहुत मंहगी पड़ी थी और यह तय हो गया था कि उन्हें भारत छोड़ना तो पड़ेगा। गाँधी ने टिप्पणी की – इतनी खोखली जीत के लिए इतना रक्तपात! खोया गाँधी ने भी था इस जेलयात्रा में कस्तूरबा और अपने अनन्य साथ महादेव देसाई के साथ-साथ अपने स्वास्थ्य को भी। सुनने में आगा खां महल कोई शानदार इमारत लगता है लेकिन दलदली ज़मीन पर बसा यह पुराना महल मलेरिया के विस्तार के लिए एकदम अनुकूल था। वोलपर्ट इसे भारत की कुछ सबसे भयावह जेलों से भी बद्तर बताते हैं।[12] देश भर में उनकी रिहाई के लिए प्रदर्शन हुए और अंततः 6 मई 1944 को उन्हें रिहा कर दिया गया। उन्हें मलेरिया हो गया था और कुछ दिनों बम्बई रहने के बाद वह 2 जुलाई को डॉक्टरों की सलाह पर आराम करने के लिए पंचगनी पहुँचे।

 

(मेरी शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक – उसने गाँधी को क्यों मारा – से )


स्रोत 

[1]देखें, पेज 285, द एसेंशियल गाँधी, (सं) लुई फिशर, रैंडम हाउस, न्यूयार्क-1962

[2]देखें, पेज 469-7, गाँधी हिज़ लाइफ एंड वर्क, (सं) डी जी तेंदुलकर तथा अन्य, कर्नाटक पब्लिशिंग हाउस, बम्बई -1944

[3]देखें, पेज 346, द एसेंशियल गाँधी, (सं) लुई फिशर, रैंडम हाउस, न्यूयार्क-1962

[4]देखें, पेज 493-95, द लाइफ एंड डेथ ऑफ महात्मा गाँधी, रॉबर्ट पेन, रूपा, दिल्ली -1997

[5]देखें, पेज 458-59, सावरकर : इकोज़ फ्रॉम अ फॉरगाटेन पास्ट, विक्रम संपत, पेंग्विन इंडिया – 2019

[6]देखें, पेज 40-45, सावरकर : मिथक और सच, शम्सुल इस्लाम, वाणी प्रकाशन, दूसरा संस्करण -2005

[7]देखें, पेज 443, अ मैटर ऑफ़ इक्विटी : फ्रीडम ऑफ़ फेथ इन सेक्युलर इण्डिया, जॉन दयाल, अनामिका पब्लिशर्स, दिल्ली -2007

[8]देखें, पेज 123, महात्मा गाँधी द लास्ट फेज़, खंड एक , नवजीवन पब्लिशिंग हाउस, अहमदाबाद – 1958

[9]देखें, पेज 40-45, सावरकर : मिथक और सच, शम्सुल इस्लाम, वाणी प्रकाशन, दूसरा संस्करण -2005

[10]इन्डियन एक्सप्रेस के 17 अगस्त 1992 के अंक में छपा लेख – क्विट इंडिया मूवमेंट अपोनेंट अनमास्क्ड

[11]देखें, पेज 111, महात्मा गाँधी द लास्ट फेज़, खंड एक , नवजीवन पब्लिशिंग हाउस, अहमदाबाद – 1958

[12]देखें, पेज 205, गाँधीज़ पैशन, स्टेनली वोलपर्ट, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयार्क – 2001

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